शांत दिमाग से सोचना और विचार करना....
क्या कभी आपके घर कोई डॉक्टर आया, जिसने कहा हो कि आपके घर में कोई गर्भवती महिला है, जिसका अल्ट्रासाउंड करके वो बता देगा कि गर्भ में लड़का
है या लड़की?
क्या कभी आपके घर में किसी परीक्षा से सबंधित कोई कर्मचारी आया है जिसने कहा हो
कि सम्बंधित परीक्षा का पेपर इतने रुपये में मिल रहा है?
क्या आपके घर कभी यूनिवर्सिटी से कोई व्यक्ति आया है जिसने कहा हो कि वो आपकी संतानों
के नंबर बढ़वा देगा?
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पिछले दो दशकों से अधिक के अध्यापन अनुभव में एक बात स्पष्ट रूप से देखने को मिली
कि लगभग हर साल कुछ न कुछ अभिभावक आते हैं अपने बच्चों की सिफारिश लेकर. कुछ परीक्षा
के दौरान ही 'कुछ देख लेने'
का इरादा लेकर आते हैं; कुछ आते हैं जो परीक्षाओं बाद 'कुछ हो सकता है क्या?' के विचार के साथ आते हैं; कुछ वायवा-प्रैक्टिकल के समय अपने मंतव्य के
साथ आते हैं. ठीक ऐसी ही स्थिति प्रतियोगी
परीक्षाओं के दौरान भी देखने को मिलती है. परीक्षा तिथि के पहले ही सब सेट कर लेने
की मानसिकता में अभिभावक भटकने लगते हैं. लाखों रुपये में जो पेपर बेचे जा रहे हैं,
उनके सन्दर्भ में विचार करिए कि कितने
परीक्षार्थी सीधे तौर पर लाखों रुपये का सौदा करते हैं? बहुतायत के अभिभावक ही सामने आते हैं.
किसी भी सरकार को, किसी भी
व्यवस्था को दोष देने के पहले हम सबको अपने ही गिरेबान में झाँकना चाहिए. कोई सीधे
हमारे पास नहीं आता, हम भी भ्रष्ट
बनने को आतुर रहते हैं और उस तरफ जाते हैं. सिस्टम में लगे लोगों को न इस व्यवस्था
से मतलब होता है और न ही किसी परीक्षार्थी के भविष्य से. वे भौतिकतावाद के बाजार में
उत्पाद लेकर खड़े हैं, जहाँ अभिभावक
ग्राहक के रूप में उपलब्ध हैं. कल को यही ग्राहक
समाप्त हो जाएँ तो ये भ्रष्ट व्यवस्था किसे अपने पेपर बेचेगी? यहाँ वही बात सामने आती है कि हम सब चाहते हैं
कि क्रांति हो, आन्दोलन हो,
व्यवस्था बदले किन्तु इनके लिए कोई शहीद,
कोई बलिदानी पैदा हो तो पड़ोस में हो. हमारी
संतान कुछ बने, कहीं से उच्च शिक्षा
ले मगर व्यवस्था बदलने के लिए, भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई संतान आगे बढे तो वो पड़ोस की हो.
अपनी सोच बदलिए साहब, बिना
सोच बदले आप बस अपने मन की भड़ास निकालते रहेंगे और अगले ही पल अवसर मिलते ही अपने बच्चे
के लिए गुहार लगायेंगे 'कुछ हो
सकता है क्या?'
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