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31 मई 2026

आवश्यकता नीयत सुधारने की है

देश की सुरक्षा के लिए तत्पर रहने वाली वायु सेना को अब परीक्षार्थियों के भविष्य को सुरक्षित रखने का जिम्मा भी सौंपा गया है. नीट परीक्षा प्रश्न-पत्र के लीक हो जाने के बाद पुनः आयोजित होने वाली नीट परीक्षा को पूर्णतः सुरक्षित बनाने के लिए सरकार भारतीय वायु सेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. इस बार परीक्षा प्रश्नपत्रों को सामान्य परिवहन के स्थान पर वायु सेना के विमानों से केन्द्रों तक सुरक्षित ढंग से एयरलिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है. इसे कुछ लोग भले ही परीक्षा के प्रति गम्भीरता के रूप में देखें किन्तु प्रथम दृष्टया यह हास्यास्पद प्रस्ताव ही कहा जाना चाहिए. समूची प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र, नागरिकों के लिए यह एक तरह का शर्मनाक बिन्दु है जबकि देश की सुरक्षा करने वाली सेना अब परीक्षा प्रश्नपत्रों को इधर-उधर ले जाने का काम करेगी.

 

पिछले कुछ वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के, शिक्षा सम्बन्धी प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों का सार्वजनिक हो जाना, उनकी गोपनीयता उजागर हो जाना एक आम चलन के रूप में उभर कर सामने आया है. किसी संक्रामक बीमारी की तरह यह एक परीक्षा से होते हुए दूसरी परीक्षा के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य के लिए बढ़ती दिखने लगी है. परीक्षा प्रश्नपत्रों को सार्वजनिक करने का कार्य दो-चार व्यक्तियों द्वारा नहीं होता है बल्कि इसके पीछे एक तरह का सिंडिकेट काम करता है. भले ही किसी परीक्षा प्रश्नपत्र के सार्वजनिक होने की घटना को प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामी कहा जाये मगर सोचने वाली बात ये है कि क्या इस तरह के काम बिना किसी संरक्षण के संभव हो सकते हैं? प्रश्नपत्रों के बनने से लेकर उनके प्रकाशन तक, उनको व्यवस्थित करने से लेकर परीक्षा केन्द्रों तक पहुँचाने तक का कार्य नितांत गोपनीयता के साथ पूरा किया जाता है. ऐसे में कैसे सम्भव है कि किसी बड़े रसूखदार के संरक्षण बिना प्रश्नपत्र बाजार में बिकते दिखाई देने लगें. प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन तक की लम्बी प्रक्रिया में जरा सी चूक से परीक्षा आयोजित कराने वाली बड़ी-बड़ी एजेंसियों की गोपनीयता पर भले ही सवाल उठ रहे हों किन्तु ऐसा कार्य तंत्र के भीतर बैठे लोगों की सहायता के बिना हो ही नहीं सकता है. इस तरह के कृत्य करने वाले माफियाओं को विभिन्न प्रकार का राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण मिलता है.

 



इस पूरे संकट के उभरने के बाद कुछ निश्चित से कदम उठाये जाने लगते हैं. व्यवस्थागत सुधार के बजाय राजनीतिक खेल शुरू हो जाता है. सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगता है. विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और भ्रष्टाचार बताता है तो सत्तापक्ष इसे विरोधियों की साजिश कहकर अपना पल्ला झाड़ लेता है. सत्तापक्ष इसके साथ-साथ धरपकड़ करने की अपनी कार्यवाहियों को भी अंजाम देता रहता है. चार-छह छोटी मछली कहे जाने वाले व्यक्ति गिरफ्तार कर लिए जाते हैं, पूछताछ का प्रक्रम शुरू हो जाता है और फिर सालों-साल चलने वाली कानूनी प्रक्रिया की आड़ में लोग असली मुद्दा ही भूल जाते हैं. इन सबके बीच राजनीतिक असंवेदनशीलता यह होती है कि ऐसे मामलों को चुनावी रैलियों में, भाषणों में अपने प्रचार का माध्यम बना लिया जाता है मगर इस समस्या के स्थायी समाधान पर कोई भी चर्चा नहीं करता है.

 

इस तरह के घटनाक्रमों में यदि सबसे ज्यादा नुकसान में कोई रहता है तो वह आम परीक्षार्थी होता है, उसका परिवार होता है. दिन-रात की तैयारी के बाद पेपर लीक होना, पुनः पेपर देने के दौरान आशंकित बने रहना परीक्षार्थियों के भविष्य को भी धुंधलके में रखता है. एक आम परिवार अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए अपना पेट काटकर उसे तैयारी करवाता है. कई परिवार तो अपनी जमीन गिरवी रख कर्ज लेते हैं. प्रश्नपत्र सार्वजनिक होने के कारण परीक्षा रद्द होने का अर्थ समय की बर्बादी मात्र नहीं बल्कि परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ का पड़ना होता है. अनेक परीक्षार्थी मानसिक तनाव में आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं. आज इक्कीसवीं सदी में पहुँच जाने के बाद भी, तकनीक के लगातार विकास करने के बाद भी, उपग्रहों के द्वारा पल-पल की खबर रखने के बाद भी आज के युवाओं को सुरक्षित और पारदर्शी माहौल देने में नाकामी हाथ लग रही है.

 

तकनीक के इस दौर में किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित न रख पाना हमारी तकनीकी और प्रशासनिक तंत्र  की बड़ी विफलता तो है ही साथ ही नागरिक अनुशासन की भी असफलता है. सोचने वाली बात ये है कि प्रश्नपत्र सार्वजनिक करने वाला सिंडिकेट ऐसा काम किसके लिए करता है? क्या ऐसा काम किसी राजनेता को चुनाव जिताने के लिए किया जाता है? क्या प्रश्नपत्र लीक किये जाने के पश्चात् अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाती है? क्या इससे विदेश-नीति में किसी तरह का लाभ हो जाता है? प्रश्नपत्र सार्वजनिक करके का कार्य उन्हीं परीक्षार्थियों के लिए किया जाता है जिनको परीक्षा देनी होती है. प्रश्नपत्र भी उन्हीं के हिस्से में आता है जिनके अभिभावकों द्वारा भारी-भरकम धनराशि सम्बंधित सिंडिकेट तक पहुँचाई गई होती है. ऐसे में यदि राजनीतिक, प्रशासनिक व्यवस्था को दोषी माना जाता है तो नागरिकों को भी पूर्णतः दोष-मुक्त नहीं रखा जा सकता है. ऐसे में बाहरी आवरण को मजबूत और तकनीकयुक्त बनाने से कहीं ज्यादा कारगर होगा तंत्र के भीतर की व्यवस्था को मजबूत करना, उस पर सशक्त-सजग निगाह रखना. देखा जाये तो जितनी बड़ी समस्या परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों के सार्वजनिक होने की है, परीक्षाओं की गोपनीयता भंग होने की है उससे बड़ी समस्या उस नीयत की कमी का होना है जो भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करना चाहती है. राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक रूप से कहीं से भी अब जिम्मेदारी भरा ऐसा प्रयास नहीं दिखता जो भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करना चाहता हो.

 

अब केवल कड़े बयानों, कुछ छोटी-छोटी गिरफ्तारियों से काम नहीं चलने वाला. अब राजनैतिक-प्रशासनिक-सामाजिक तंत्र में बैठे ऐसे लोगों को चिन्हित किये जाने की, कड़ी सजा देने की आवश्यकता है जो परीक्षाओं की गोपनीयता के साथ-साथ परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं.


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