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23 मई 2026

पारिवारिकता, संस्कार और संस्कृति की शिक्षा देतीं अम्मा

अम्मा! बचपन से इस शब्द को एक जीव के रूप में नहीं बल्कि एक जीवन के रूप में देखा है. बिना किसी लाग-लपेट के कहा जाये तो हम लोग बौद्धिक होने के बाद शब्दों से खेलना सीख जाते हैं और एक समय के बाद अपने ही अम्मा-पिताजी को शिक्षा देना शुरू कर देते हैं, उनके बारे में ऐसा आदर्शवाद बिखेरना शुरू कर देते हैं जो बहुतायत में उनके वास्तविक जीवन से बहुत दूर होता है.


बहरहाल, बचपन के बहुत ही शुरूआती दिनों की याद आज भी है. न केवल हम ही बल्कि अम्मा भी कई बार आश्चर्य करती हैं कि एकदम शुरूआती दिनों की बातें कैसे याद हैं हमें. उन यादों के सहारे आज तक की यात्रा करते हैं तो समझ ही नहीं आता है कि अम्मा के बारे में क्या लिखा जाये, क्या छोड़ा जाए. सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में रहने के अस्सी-नब्बे के दशक के जो भी संस्कार थे उनके अनुपालन में पिताजी के साथ संवाद का माध्यम अम्मा ही बनती थीं. ये और लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है कि अम्मा की ये भूमिका न केवल हम तीनों भाइयों के लिए थी बल्कि पिताजी के तीनों छोटे भाइयों के लिए भी थी. हमारे तीनों चाचाओं का हम लोगों के साथ उनकी नौकरी, शादी होने तक रहना हुआ. चाचा लोगों का अपने बड़े भाई (हमारे पिताजी) के प्रति सम्मान के भाव ने सदैव अम्मा को ही हर बात के लिए आगे किया. होली-दीपावली पर तो निश्चित रूप से सभी चाचा लोगों का सपरिवार उरई आना होता था. पूरे परिवार के साथ समन्वित, संतुलन अम्मा की कार्य-प्रणाली में सहज भाव से देखने को मिलता.


हम तीनों भाइयों की अम्मा समय के साथ पूरे परिवार की अम्मा तो बनी हीं हमारे बाद की पीढ़ी के लिए भी अम्मा ही सम्बोधित हुईं. न केवल हम तीनों भाइयों की मित्र-मंडली में बल्कि मोहल्ले में भी वे अम्मा के रूप    में ही पहचान बनाये हुए हैं. उनके शब्दों से ज्यादा उनके कार्यों को देख-देखकर प्रेरणा मिली. वो समय आज भी याद  है जबकि हमारी अइया (दादी) गुल्ला टूट जाने के कारण कानपुर में एक हॉस्पिटल में भर्ती थीं. उनकी शारीरिक अवस्था के कारण ऑपरेशन सम्भव नहीं दिख रहा था. ऐसे में दस-बारह दिन की उनकी परेशानी देखकर एक दिन अम्मा ने वहाँ के डॉक्टर से स्पष्ट शब्दों में कहा कि कल हम लोगों को रिलीव करिए. हमने जैसे अपने बेटों की टट्टी-पेशाब साफ़ कर ली वैसे इनकी भी कर लेंगे. इस समय येहमारे लिए हमारी सास से ज्यादा एक छोटे बच्चे जैसी हैं.


उस समय की दृढ़ता के बाद अम्मा की जीवटता, उनका आत्मबल सामने लाने के लिए प्रकृति ने भी कम उत्पात न रखा. पिताजी का देहांत, अगले ही महीने हमारा ट्रेन दुर्घटना के चलते साल भर बिस्तर पर पड़े रहना, कालांतर में सबसे छोटे भाई की असमय मृत्यु ने परिवार में उथल-पुथल तो मचाई मगर ऐसे विषम समय में भी अम्मा के संयम, धैर्य, जीवटता के बारे में सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है. आज भी उन पलों में अम्मा की छवि का स्मरण हो जाता है तो आँखें नम हो जाती हैं.


परिवार को साथ लेकर चलने की कला, सबकी बातों को सुनकर भी एकजुटता के साथ आगे बढ़ने का संयम, तीन-चार पीढ़ियों के साथ सामंजस्य बनाकर चलने की कुशलता, सबकी सहायता के लिए आगे रहने की मानसिकता को अम्मा से सीखने को मिला. आज वे उम्र के 75 वर्ष पूरे करने के बाद भी पूरी सक्रियता, चैतन्यता के साथ हम लोगों को अपना आशीर्वाद दे रही हैं. यद्यपि उनकी अति-सक्रियता के चलते उत्पन्न होने वाली उम्र सम्बन्धी शारीरिक समस्याओं के चलते कई बार उनको रोका-टोका जाता है तथापि यह अवश्य ही सीखने को मिलता है कि जब तक साँस है तक तक जीवन में सक्रियता, सजीवता बनी रहनी चाहिए. ये बात आज भी अम्मा को सक्रिय देखकर सीखने को मिल रही है. 


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