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05 मई 2026

जनादेश, व्यक्तिगत अहंकार और संविधान

भारतीय संविधान लोकतान्त्रिक व्यवस्था जनादेश को मान्यता देती है तो जनप्रतिनिधियों से भी आदर्श स्थापन की अपेक्षा करती है. वर्तमान में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल विधानसभा चुनाव हार चुका है और भाजपा बड़े दल के रूप में सामने आई है. चुनाव परिणामों की इस स्थिति में सामान्य कदम सत्ताधारी दल के मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा देना होता है किन्तु पश्चिम बंगाल में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा देने से इनकार करना लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ-साथ संविधान से भी मजाक करने जैसा है. सामान्य रूप में इसे भले ही एक राजनीतिक संकट के रूप में देखा जा रहा हो किन्तु ऐसा नहीं है. भारतीय संविधान ऐसी स्थितियों में भी सशक्त प्रावधानों के साथ जनादेश के विरुद्ध सत्ता हथियाने के कुत्सित इरादों को रोकता है.

 

सबसे पहले यहाँ संविधान के अनुच्छेद 172(1) की उस शक्ति को समझना होगा, जिसके अनुसार राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तिथि से पाँच वर्ष के लिए होता है. इस पाँच वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् सम्बंधित विधानसभा का विघटन हो जाता है. यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को समाप्त हो रहा है. ऐसे में निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भले ही इस्तीफ़ा न देने की जिद पर अड़ी हों मगर उनको ये समझना होगा कि वर्तमान विधानसभा के संवैधानिक रूप से अस्तित्वहीन हो जाने पर उनका अस्तित्व क्या होगा? विधानसभा के अस्तित्व में न रहने की स्थिति में उसके आधार पर नियुक्त मुख्यमंत्री और उसकी मंत्रिपरिषद का कानूनी एवं संवैधानिक आधार स्वतः ही समाप्त हो जाएगा. सदन के अस्तित्व में न रहने पर किसी व्यक्ति का अपने पद का बने रहना संवैधानिक रूप से असंभव है.

 


इस संवैधानिक अनुच्छेद के होने के साथ-साथ विवाद की ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका प्रमुख हो जाती है. अनुच्छेद 164(1) के अन्तर्गत राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है और मुख्यमंत्री भी राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद पर कार्य करता है. सामान्य स्थितियों में मुख्यमंत्री का अपने पद पर बने रहना सदन में उसके प्रति बहुमत से निर्धारित होता है किन्तु चुनाव जैसी स्थितियों में इसका निर्धारण जनादेश के माध्यम से होता है. पश्चिम बंगाल में स्पष्ट है कि वर्तमान सत्ताधारी दल पराजित हो चुका है, ऐसे में वहाँ राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ सक्रिय हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ तथा इसके बाद के अनेक निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण सदन के पटल पर होना चाहिए लेकिन जब नई विधानसभा के चुनाव संपन्न हो चुके हों तो नया जनादेश पिछले किसी भी बहुमत पर भारी पड़ता है. सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 11 मार्च 1994 को यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. यद्यपि इस मामले का मुख्य उद्देश्य अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग रोकना और सदन के पटल पर बहुमत परीक्षण को अनिवार्य बनाना था तथापि इसी निर्णय में न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनादेश ही सरकार की वैधता का अंतिम स्रोत है. जैसे ही नई विधानसभा के चुनाव होते हैं, पुरानी विधानसभा और उसके विश्वास का आधार समाप्त हो जाता है. स्पष्ट है कि ममता बनर्जी वर्तमान में अपने मुख्यमंत्रित्व के अस्तित्व में नहीं हैं. वैसे भी संवैधानिक रूप से चुनाव परिणामों के पश्चात निवर्तमान मुख्यमंत्री का इस्तीफा अनिवार्य कदम नहीं बल्कि यह एक लोकतांत्रिक शिष्टाचार और परम्परा है. इसके उल्लंघन होने पर राज्यपाल संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हुए निवर्तमान मुख्यमंत्री को पदमुक्त करने का, बर्खास्त करने का आदेश भी जारी कर सकते हैं. ऐसा कदम पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ममता बनर्जी के सन्दर्भ में भी उठा सकते हैं क्योंकि ममता बनर्जी के पास अब न तो जनादेश है और न ही सदन का अस्तित्व.

 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 73 के अन्तर्गत चुनाव आयोग नई विधानसभा के गठन के लिए विधिवत गठित अधिसूचना जारी करता है. अधिसूचना के जारी होते ही नई विधानसभा अस्तित्व में आ जाती है. अब चूँकि पश्चिम बंगाल में इसी 07 मई को पुरानी विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और अगले दिन राज्य में वैध सरकार न होने की स्थिति में राज्यपाल ऐसा कदम उठाने के लिए स्वतन्त्र हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद चुनाव आयोग ने नई विधानसभा के गठन हेतु आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है. यह अधिसूचना राज्यपाल को सौंपी जा चुकी है जिसके पश्चात नई सरकार के गठन तथा शपथ ग्रहण का मार्ग प्रशस्त हो गया है. ममता बनर्जी भले ही पद न छोड़ रही हों किन्तु अब राज्यपाल को संवैधानिक अधिकार है कि वे चुनाव आयोग की अधिसूचना प्राप्त हो जाने के बाद भाजपा के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं. राज्यपाल अनुच्छेद 163 और 164 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए विजयी दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं. नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण लेते ही पूर्व मुख्यमंत्री का दावा कानूनी रूप से शून्य हो जाएगा. प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी राज्यपाल द्वारा नई सरकार के गठन का आदेश देते ही राज्य की सम्पूर्ण नौकरशाही नए मुख्यमंत्री के प्रति उत्तरदायी हो जाती है. निवर्तमान मुख्यमंत्री का कोई भी आदेश अवैध माना जाएगा. स्पष्ट है कि राज्यपाल का आदेश स्वतः ही ममता बनर्जी की जिद को अस्तित्वहीन कर देगी.

 

भारतीय लोकतंत्र में जनादेश सर्वोच्च है. यदि ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं तो भी वे केवल एक कब्जेधारी की स्थिति में होंगी न कि संवैधानिक शासक की. संविधान ने राज्यपाल को अनेक विवेकाधीन अधिकार दिए हैं जिनके द्वारा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी भी व्यक्तिगत अड़ियल रुख को दूर किया जा सके. विधानसभा का पाँच वर्ष पूरा होना ममता बनर्जी के अड़ियलपन के ताबूत में अंतिम संवैधानिक कील होगा. इसके बाद भाजपा का सरकार बनाना न केवल राजनीतिक वास्तविकता होगी बल्कि एक अनिवार्य संवैधानिक कदम भी.


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