पिछले दिनों अमेरिका की वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के एक बयान के बाद भारतीय समाज
में हलचल सी मच गई. इसमें न केवल राजनीति बल्कि बौद्धिक वर्ग, मीडिया, सोशल
मीडिया, आमजनमानस चर्चा में शामिल हुआ. इस चर्चा में केन्द्र
सरकार को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जाने लगा.
ईरान के साथ चल रहे अमेरिका-इजरायल युद्ध के बीच अमेरिकी वित्त मंत्री ने बयान
जारी करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को तीस दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की
अनुमति दी है. इस बयान के आते ही देश में केन्द्र सरकार को कमजोर बताया जाने लगा.
विपक्षी दलों द्वारा पहले से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सरेंडर नरेंदर
का नारा उछाला जा रहा था, इस बयान से इस नारे को और हवा
मिली.
यहाँ एक बात समझने वाली है कि राजनीतिज्ञों का कार्य हमेशा से किसी भी तरह के
बयानों को, कार्यों को,
आँकड़ों को, जानकारियों को अपने मनमुताबिक तोड़-मरोड़ करके उसे
जनता के बीच अपने लाभ के सन्दर्भ में उछालना रहा है. इस स्थिति से परिचित होने के
बाद भी बौद्धिक वर्ग से जुड़े हुए लोगों द्वारा, मीडिया से
जुड़े संस्थानों, व्यक्तियों ने, सोशल
मीडिया पर सक्रिय लोगों ने बिना जाने-समझे, बिना जाँचे-परखे
अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान पर सरकार को दोषी ठहराना शुरू कर दिया. अमेरिकी
वित्त मंत्री के बयान को परमसत्य मानने से पहले उसके मूल में छिपे सन्दर्भ को भी
समझ लिया होता तो शायद सच्चाई समझ आती. उनके इस बयान के पीछे कुछ समय पूर्व
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा भारत पर टैरिफ का लगाया जाना मुख्य बिन्दु रहा.
दरअसल ट्रम्प ने भारत पर पचास प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जो
समूचे देशों पर लगाये गए टैरिफ से कहीं ज्यादा था. इसके लगाये जाने की जो वजह
अमेरिका द्वारा बताई गई थी, उसने अमेरिकी वित्त मंत्री के
हालिया बयान को मजबूती प्रदान की. गत वर्ष अगस्त माह में अमेरिका द्वारा भारत पर
ज्यादा टैरिफ लगाए जाने का कारण रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत द्वारा रूस से
तेल लेना बताया गया. अमेरिका का मानना है कि ऐसा करके भारत रूस की आर्थिक मदद कर
रहा है.
ऐसे में एकबारगी अमेरिका के बयानों पर ध्यान देने के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति
ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में उनके द्वारा दिए जा रहे बयानों, उनके कार्यों का आकलन ही कर लिया
जाता तो भी भारत को रूस से तेल लेने के लिए तीस दिनों की अनुमति दिए जाने के
सन्दर्भ में स्थिति स्पष्ट हो जाती. ऑपरेशन सिन्दूर के समय में भी ट्रम्प के बयानों
में बार-बार जोर दिया जाता रहा कि उनकी कोशिशों से ही युद्ध रुका. इस तरह की
बयानबाजी के बाद देश की केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया. किसी आधिकारिक
साईट पर जाकर सच देखने का प्रयास नहीं किया गया. ट्रम्प के ऐसे बयानों के बाद भी
हमारे देश के अनेक सैन्य अधिकारियों, विशेषज्ञों के लगातार
बयान आते रहे कि परमाणु हथियारों से सम्बंधित सुरक्षा को देखते हुए भारत द्वारा
युद्ध-विराम जैसा कदम उठाया गया, न कि अमेरिका के दबाव में.
इन बयानों की सत्यता उस समय और पुख्ता होती है जबकि स्टेट ऑफ द यूनियन के
सम्बोधन में ट्रम्प ने कहा कि उन्होंने भारत के ऑपरेशन सिंदूर को रोककर तीन करोड़
से अधिक लोगों की जान बचाई थी. उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने कहा
था कि अगर उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया होता तो ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 3.5 करोड़
लोग मारे जाते. ट्रम्प ने अकेले ऑपरेशन सिन्दूर को रुकवाने की बात नहीं की बल्कि
उनके द्वारा आठ युद्ध रुकवाने का भी दावा किया गया. देश के तमाम बयानवीर अभी
ट्रम्प द्वारा तेल लेने की अनुमति सम्बन्धी कथित बयान पर अटके हुए हैं, उधर ट्रम्प ने अपने बड़बोलेपन में एक
और विवादित बयान मीडिया के सामने सरका दिया. उन्होंने कहा कि उनके सैन्य अधिकारियों
को ईरान के जहाजों को डुबोने में मजा आ रहा है. सोचा जा सकता है कि ट्रम्प किस हद
तक अमानवीय होकर अपने बयानों को, अपने क़दमों को उठा रहे हैं.
ट्रम्प के ऐसे बयान उनको शांति का नोबेल पुरस्कार न मिल पाने की हताशा है.
युद्ध उनके द्वारा महज अपनी हताशा को छिपाने और खुद को सर्वशक्तिशाली दिखाने के
लिए किये जा रहे हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रत्यक्ष रूप से यूक्रेन का भले ही
साथ देना रहा हो मगर कूटनीतिज्ञ रूप से जेलेंस्की के साथ अमेरिका में किया गया
बर्ताव उनकी अगम्भीरता को दर्शाता है. अब जबकि रूस से तेल लेने को अमेरिका द्वारा
कथित अनुमति की चर्चा चरम पर है, उसी समय अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट बयान देते हैं कि पश्चिम
एशिया में सैन्य तनाव को देखते हुए वैश्विक तेल बाजार को स्थिर रखने हेतु अमेरिका
ने भारत से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था. सीएनएन को दिए गए साक्षात्कार में
ऊर्जा मंत्री क्रिस राईट ने बताया कि उन्होंने अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट
बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बातचीत कर समुद्र में पहले से उपस्थित
रूसी कार्गो को भारतीय रिफाइनरियों में उतार लेने का आग्रह किया.
सोचने वाली बात है कि जो अमेरिका दो-चार दिन पहले भारत को अनुमति देने जैसी
शब्दावली का प्रयोग कर रहा था, वही अब आग्रह जैसी भाषा बोल रहा है. दरअसल, अमेरिकी
राष्ट्रपति ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़बोलेपन का ही उदाहरण पेश किया है, वो चाहे वैश्विक युद्ध रुकवाने की बात हो, नोबेल
शांति पुरस्कार हो, टैरिफ हो या कि अब तेल खरीदने वाली बात
हो. ऐसा लगता है कि ट्रम्प भली-भांति समझ चुके हैं कि भारत का विपक्ष इस स्थिति
में है कि वह किसी भी छोटी से छोटी बात, झूठी बात के लिए केन्द्र सरकार का विरोध
व्यापक स्तर पर करना शुरू कर देता है. इस मानसिकता को समझते हुए भारत को तेल खरीदे
जाने की अनुमति देने जैसा बयान दिया. ये और बात है कि मुँह की खाने के बाद अमेरिका
को अपने बयान से उलटना पड़ा. काश! ये बात भारतीय विपक्षी दल समझ पाता.
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