11 July 2017

धर्म-विहीन आतंकवाद का अमरनाथ यात्रा बस पर हमला

गंगा-जमुनी संस्कृति की दुहाई के बीच, किसी के बाप का नहीं है हिंदुस्तान की मंचीय चिंघाड़ के बीच, सहिष्णुता-असहिष्णुता की नौटंकी के बीच आतंकियों ने अपना काम करके दिखा दिया. इस बार अमरनाथ यात्रा पर संकट के बादल पहले से ही मंडरा रहे थे. सुरक्षा एजेंसियों ने भी खतरे को देखते हुए हमले की आशंका व्यक्त की थी. ये हमला आतंकियों ने किया जबकि इससे कुछ समय पूर्व अमरनाथ यात्रा काफिले पर पत्थरबाजी की गई थी. स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में चरमपंथी, अलगाववादी नहीं चाहते हैं कि अमरनाथ यात्रा सुचारू रूप से चले. इस हमले के सन्दर्भ में एक विशेष बात गौर करने लायक है कि आतंकियों ने हमले के लिए अनंतनाग को चुना. ये वही अनंतनाग है जहाँ लोकसभा उपचुनाव को अलगाववादियों की चुनाव बहिष्कार करने की धमकी के चलते रद्द करना पड़ा. अनंतनाग के पूर्व श्रीनगर में हुए लोकसभा उपचुनाव में सात प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ था. कुछ जगहों पर पुनर्मतदान कराया गया जो मात्र दो प्रतिशत के आसपास रहा. इससे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अलगाववादियों की हनक का पता चलता है.


देश में लोकसभा चुनाव से पूर्व ही तमाम राजनैतिक दलों द्वारा जिस तरह से भाजपा और मोदी के खिलाफ हवा बनाई गई, जिस तरह से मुस्लिमों के मन में नफरत भरी गई वो तबसे और चरम पर है जबसे भाजपा केंद्र में सत्ता में आई है. नफरत का आलम ये है कि देश के उच्च शैक्षणिक संस्थान में आतंकी के समर्थन में नारेबाजी की जाती है. ये नफरत की स्थिति उस समय और भी चरम रूप में दिखी जबकि जम्मू-कश्मीर में भाजपा गठबंधन सरकार में शामिल हुई. पाकिस्तान की तरफ से मिलती आतंकी शह का दुष्परिणाम ये हुआ कि वहाँ अलगाववादियों ने अपनी दुर्दांत हरकतों को और तेजी से करना आरम्भ कर दिया. जम्मू-कश्मीर में आतंकी के जनाजे में हजारों की भीड़ इकठ्ठा होती है वहीं दूसरी तरफ सेना के ऊपर पत्थरबाजी की जाती है. वहाँ देश का राष्ट्रीय ध्वज जलाया जाता है, पाकिस्तानी झंडा लहराया जाता है, सैनिकों का अपमान किया जाता है. ये कितनी हास्यास्पद स्थिति है कि जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं की निरंतरता के बाद भी उन पर सख्ती बरतने के किसी भी प्रयास को न केवल राज्य सरकार द्वारा वरन अदालत द्वारा भी रोका गया. सेना को सैनिकों को परेशान करने वालों को भटका हुआ बताकर कहीं न कहीं अलगाववादियों को चरमपंथियों को ही संरक्षण दिया गया. इसी का दुष्परिणाम है कि सरकार के चाहने के बाद भी राज्य में शांति का माहौल नहीं है.


अमरनाथ यात्रा की बस पर हालिया आतंकी हमला विशुद्ध रूप से उस खिसियाहट के नतीजा है जो जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता, चरमपंथी नेता, पाकिस्तान समर्थित आतंकी आये दिन दर्शाते हैं. ये हमला यात्रियों को डराने की दृष्टि से नहीं वरन सरकार को सीधे-सीधे ये सन्देश देने के लिए किया गया है कि वे किसी भी तरह से सरकारी तंत्र से डरते नहीं हैं. आतंकियों ने स्पष्ट रूप से सन्देश दिया है कि तमाम सरकारी सुरक्षा व्यवस्था के बाद भी वे हमला करने में, मासूम, निर्दोष यात्रियों को मारने में सफल रहे हैं. ऐसे में अब सरकार की तरफ से सिर्फ निंदा करके, चंद श्रद्धांजलि शब्द अर्पित करके, कड़ी कार्यवाही किये जाने की बात कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाएगी. आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, कहकर कुछ धर्मनिरपेक्ष अपना उल्लू सीधा करने की कोशिश करते नजर आयेंगे. कुछ अलगाववादी नेता भी अपने आपको उभारने के लिए आगे आते दिखेंगे. कुछ दिन बाद सब इस हमले को भूल जायेंगे क्योंकि संभव है तब तक नेताओं की शांति-समझौते जैसी खोखली प्रक्रिया के बीच आतंकी कोई और हमला कर बैठें.  

1 comment:

ताऊ रामपुरिया said...

आतंकवाद का धर्म नही होता पर इसी की आड में राजनीती की जारही है, कब तक आखिर कब तक निर्दोष लोग मारे जाते रहेंगे?
रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग