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28 February 2017

आधुनिकता और परम्परा का समन्वय - अंडमान-निकोबार यात्रा वृतांत

अंडमान निकोबार की यात्रा करने की इच्छा बहुत लम्बे समय से मन में थी. इसके मूल में एकमात्र कामना पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल के दर्शन करना रहा था. जिस स्थान में देश की आज़ादी के दीवानों ने ज़ुल्म सहकर भी उफ़ तक नहीं की, उस स्थान के दर्शन करने की उत्कंठा सदैव से मन में रही थी. जब-जब, जितनी बार कालापानी नामक सजा के बारे में पढ़ा, सेलुलर जेल के बारे में पढ़ा, वहाँ कैद किये गए वीर क्रांतिकारियों के बारे में पढ़ा, उनको दी जाने वाली घनघोर अमानवीय यातनाओं के बारे में जाना तब-तब, उतनी-उतनी बार सेलुलर जेल के दर्शन करने की उत्कंठा और तीव्र होती रही. लम्बे समय की आकांक्षा इस बार पूरी हुई और फरवरी में अंडमान निकोबार की यात्रा करने का अवसर आ ही गया. पोर्ट ब्लेयर के वीर सावरकर अंतरराष्ट्रीय विमानपत्तन पर कदम रखते ही प्राकृतिक सौन्दर्य की अनुभूति हुई वहीं वीर सावरकर नाम आँखों के सामने आते ही मन जोश से, गर्व से भर गया. पहले ही दिन सेलुलर जेल के दर्शन करने के साथ ही अपनी अंडमान निकोबार यात्रा का आरम्भ किया. वहाँ के इतिहास की जानकारी अध्ययन के दौरान हुई उस जानकारी को, वहाँ बंदी वीर क्रांतिकारियों की अप्रत्यक्ष उपस्थिति को जेल की सात विंग्स में से शेष बची तीन विंग्स में महसूस किया. जेल की छोटी-छोटी कोठरियों, फाँसीघर, अमानवीय यातनाओं के औजारों को देखकर सिरहन सी दौड़ गई. (बहरहाल, इसके बारे में विस्तार से)


अंडमान निकोबार के आसपास के अन्य दर्शनीय स्थानों की सैर करते समय, एक टापू से दूसरे टापू तक जाने में छोटे जहाज अथवा फैरी की यात्रा के दौरान अपने साथ के अन्य सैलानियों को भी देखा. बहुतायत में नवयुगलों का आना वहाँ हो रहा था. हैवलॉक हो, चिड़िया टापू, रॉस आइलैंड या फिर बीच हो, बाज़ार हो, कोई स्मारक हो सभी जगहों पर नवयुगल बड़ी संख्या में दिखाई दिए. हाथों में हाथ लिए, अपनी दुनिया में खोये, आपसी चुहल, छेड़छाड़, मस्ती के अंदाज में टहलते, प्राकृतिक सुषमा का आनंद लेते अपनी इस नई पारी का लुफ्त ले रहे थे. आपसी प्यार या कहें कि प्यार जैसी स्थिति का प्रदर्शन खुलकर हो रहा था. छोटे शिप या फैरी पर चलते संगीत पर थिरकते कदम, बीच पर समुद्र की लहरों के संग बहते हुए, अल्हड़ता के साथ समुद्री जल में क्रीड़ा करते नवयुगल अपने आसपास के वातावरण से खुद को पूरी तरह अनजान बनाये हुए थे. अंडमान निकोबार से बहुत-बहुत दूर, जिसे वहाँ के स्थानीय निवासी मेनलैंड पुकारते हैं, अपने-अपने शहरों के परिचित वातावरण से दूर नितांत अपरिचित माहौल में नवजीवन की रंगीनियों का आनंद उठाते दिखाई दिए. 


जब यात्रा का आनंद लिया जा रहा हो, बीच के किनारे टहला जा रहा हो, समुद्र की लहरों में एकसाथ बहते जाना हो, हास-परिहास के बीच मस्ती की जा रही हो, अनजान वातावरण में अल्हड़ता के साथ हाथों में हाथ डाले चले जाना हो तब देह वस्त्रों का बोझ उठाने में सक्षम नहीं दिखती. नवयुगल पारंपरिक परिधानों से अलग स्वतंत्रता का बोध लिए छोटे-छोटे कपड़ों में जगह-जगह विचरण करते दिखे. लड़के-लड़कियाँ दोनों ही वस्त्रों की लम्बाई-चौड़ाई में कंजूसी बरतते दिखे. बहुत से लोग सवाल उठा सकते हैं कि आखिर कोई बात वस्त्रों पर आकर, छोटे वस्त्रों पर आकर ही क्यों टिक जाती है? यहाँ लेखक का मकसद किसी भी रूप में वस्त्रों पर सवालिया निशान उठाना है ही नहीं. महज छोटे-छोटे कपड़ों से या फिर किसी जोड़ी की उम्र देखकर उसके नवदंपत्ति होने, नवविवाहित होने का संकेत कतई नहीं मिला. जो मुख्य बात ऐसी समस्त जोड़ियों में दिखाई दी वो ये कि लड़कियों की देह पर भले ही अल्पवस्त्रों का बोझ रहा हो मगर उनकी कलाईयाँ पर्याप्त रंग-बिरंगी चूड़ियों से खनक रही थीं. हाथ, पैर मेंहदी से लकदक दिखाई दे रहे थे. माथे पर सुहाग सिन्दूर दमक रहा था. 


ऐसे वातावरण में जहाँ कि ऐसे युगलों को पर्याप्त स्वतंत्रता मिल रही थी, परिधान सम्बन्धी बंधन का एहसास कराने वाला कोई परिजन नहीं दिख रहा था, आपसी चुहल-हास-परिहास सारे तटबंधों को तोड़कर बह रहा था, समुद्री लहरों में शालीनता कहीं दूर बही जा रही थी तब चूड़ियों का बोझ लादे घूमना थोड़ा अटपटा सा लगा. बेफिक्री के साथ मौज-मस्ती, आनंद उठाते लड़के-लड़कियाँ यदि देह से वस्त्रों का बोझ उतार सकते थे तो वही लड़कियाँ नाजुक कलाईयों में ढेरों चूड़ियों का बोझ किस मानसिकता से लादे हुए थी? कहीं वस्त्रों की आधुनिकता के साथ सुहाग सम्बन्धी पारम्परिकता तो नहीं? बहरहाल वे नवयुगल पूरी मस्ती में अपनी यात्रा का आनंद ले रहे थे. वे अपने आसपास के लोगों से, अपने आसपास के वातावरण से बहुत दूर सिर्फ एक-दूसरे में खोये हुए थे. प्राकृतिक सौन्दर्य के साए में उल्लासित होता उनका शारीरिक सौन्दर्य आजीवन बना रहे, जिस तरह के प्रेम का प्रदर्शन वे कर रहे थे उस प्रेम में समय के साथ गहराई आती रहे ऐसी कामना के साथ ये देखना अच्छा लगा कि इसी देश में आधुनिकता और परम्परा एकसाथ अपना विकास करते रहते हैं. 

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सभी चित्र लेखक द्वारा लिए गए हैं.

2 comments:

arun mishra said...

ati uttam

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन हास्य लेखक तारक मेहता का निधन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।