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05 September 2016

चमत्कार और ढोंग की बारीक रेखा

अंततः मदर टेरेसा को संत की उपाधि मिल गई. संत बनने के लिए आवश्यक था कि व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके नाम से दो चमत्कार हुए हों. आश्चर्य देखिये कि मदर टेरेसा के नाम से दो चमत्कार हो भी गए. जैसी कि अपेक्षा थी कि एक चमत्कार भारत में तो होगा ही और ऐसा हुआ भी. पश्चिम बंगाल में उनके नाम का एक चमत्कार हुआ. पश्चिम बंगाल में एक महिला के पेट का गंभीर ट्यूमर चमत्कारी मैडल के पेट पर स्पर्श कराने मात्र से दूर हो गया. इसी तरह का दूसरा चमत्कार ब्राजील में हुआ, जहाँ कोमा में गए व्यक्ति की सर्जरी के अंतिम प्रयास से पूर्व ही वो महज इस कारण स्वस्थ पाया गया क्योंकि उसकी पत्नी ने मदर टेरेसा की प्रार्थना की थी. आश्चर्य देखिये, संत घोषित किये जाने की इस परम्परा में पोप द्वारा चमत्कारों को प्रमाण सहित जाँचा जाता है.

बहरहाल मदर टेरेसा के भारत में कार्य करने को लेकर हमेशा से विवाद रहा है. कभी उनका नाम इलाज के बहाने धर्म परिवर्तन से जोड़ा गया तो कभी वे आरक्षण के मुद्दे पर सड़क पर उतरती दिखी. कष्टों में व्यक्ति ईश्वर के सबसे करीब होता है, का पाठ पढ़ाने वाली मदर टेरेसा के आश्रम में मरीजों को मामूली चिकित्सा के सहारे अपने कष्टों का निवारण करना होता था जबकि वे स्वयं बीमारी की अवस्था में इलाज के लिए विदेश जाती थीं. सोचने का विषय है कि क्या वे कष्ट में ईश्वर के समीप जाने का लोभ नहीं रखती थीं? या कि उन्हें पहले से ज्ञात था कि वे ईश्वर की सेवक हैं, जिसे मृत्यु के बाद संत की उपाधि से विभूषित किया जायेगा? उनके भारत आने, यहाँ लोगों की सेवा करने के बहाने ईसाई मिशनरी का प्रचार-प्रसार करने से लेकर उनके अंतिम दिनों तक की कार्यप्रणाली के जहाँ प्रशंसक भी हैं वहीं विरोधी भी. हाल-फ़िलहाल तो मुद्दा ये नहीं कि उनका कार्य क्या था और वे क्या करती थीं. सवाल ये है कि जिस देश में विगत कुछ माह पूर्व कतिपय बुद्धिजीवियों ने एक समाजसेवी, जो हिन्दू धर्म के अन्धविश्वास दूर करता था, की हत्या पर अपने-अपने पुरस्कार लौटाना शुरू कर दिए थे, वहाँ मदर टेरेसा के चमत्कारों को स्वीकार्यता कैसे मिल गई? आये दिन टीवी पर, समाचारों में देखने को मिलता है कई-कई ईसाई मिशनरी मंच लगाकर अनेकानेक तरीके से हिन्दू धर्म की पूजा-पद्धति पर सवाल खड़े करते हैं. उसकी वैज्ञानिकता पर सवाल उठाते हैं, वे ऐसे तथाकथित चमत्कारों पर खामोश क्यों हैं?


किसी व्यक्ति को संत बनाने या न बनाने की रोमन कैथोलिक प्रक्रिया है. उनकी प्रक्रिया पर किसी तरह का कोई सवाल-जवाब नहीं. उनके अपने देश की, अपने धर्म की व्यवस्था है. उनकी अपनी प्रक्रिया है. भारतवासियों को उसे स्वीकार करना है या नहीं, इसका भी उनसे कोई लेना-देना नहीं. सभी धर्मों की अपनी-अपनी आस्था, अपने-अपने विश्वास हैं, उन पर अन्य धर्मावलम्बियों को तब तक सवाल खड़े भी नहीं करने चाहिए जब तक कि समाज का सामूहिकता में नुकसान न हो रहा हो. इसके बाद भी ये स्थिति विचारणीय अवश्य होनी चाहिए कि यदि एक धर्म की सारी बातें ढोंग लगती हैं; यदि उस धर्म के व्यक्ति पाखंडी समझ आते हैं; यदि हिन्दू धर्म के संत, महात्मा, बाबा आदि चोर, भ्रष्ट, दुराचारी दिखते हैं तो बाकी धर्मों के ऐसे लोग संत कैसे हो सकते हैं? बाकी धर्मों के ऐसे आस्थावान कृत्य चमत्कार कैसे हो जाते हैं? यहाँ समझना होगा कि इसी भारत देश में आज मदर टेरेसा को ‘संत’ घोषित करते ही जश्न मनाया जा रहा है. सरकारी प्रतिनिधिमंडल वहाँ जाकर उस समारोह में शामिल होता है. यदि एक व्यक्ति के संत बनाये जाने को जनसामान्य का, सरकार का समर्थन प्राप्त है तो फिर हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों पर ऊँगली कैसे उठाई जा सकती है? ये उन लोगों को भी सोचना होगा जो विगत महीने पहले एक कथित समाजसेवी की हत्या पर लामबंद हो गए थे. 

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