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23 June 2016

अभिभावक भी अपना कर्तव्य समझें

आये दिन दुर्घटनाओं में लोगों के मारे जाने के समाचार सामने आते रहते हैं. किसी की भी मृत्यु हो वो समाज के संवेदनशील लोगों को अन्दर तक आहत करती है. इसमें भी यदि दुर्घटना में मारे जाने वाले बच्चे होते हैं अथवा किशोरावस्था के लोग होते हैं तो कष्ट और बढ़ जाता है. आये दिन देखने में आता है कि कभी सेल्फी लेने के चक्कर में, कभी तेज रफ़्तार बाइक चलाने में, कभी अनियंत्रित हो जाती कार से, कभी स्कूल वैन के पलट जाने से, कभी वाहनों के आपस में टकरा जाने से अथवा कभी किसी और कारण से नौजवान मौत के मुँह में जा रहे हैं. ऐसी घटनाओं पर समाज में क्षणिक प्रतिक्रिया होती है, प्रशासन को दोष दे लिया जाता है, किसी चौराहे पर, किसी स्मारक पर जाम लगाकर नारेबाजी कर ली जाती है, कहीं एक श्रद्धांजलि सभा करके, मोमबत्तियाँ जलाकर मृतकों के प्रति संवेदनाएं प्रकट कर ली जाती हैं. इन तमाम कृत्यों के द्वारा सामान्य नागरिक अपने दायित्वों, अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है. किसी भी तरह की दुर्घटना पर प्रशासन को दोषी ठहरा देना आज आम हो गया है. दुर्घटना के लिए शासन-प्रशासन को जिम्मेवार बताकर अपने आपको दोषमुक्त कर लेने की संकल्पना आज सहज रूप में दिखाई देने लगी है. क्या वाकई एक सामान्य नागरिक का दायित्व, उसका कर्तव्य इतना ही है? क्या वाकई समूची जिम्मेवारी सिर्फ और सिर्फ प्रशासन की है? हम नागरिकों की, माता-पिता की, घर-परिवार की कोई जिम्मेवारी नहीं है? क्या शैक्षणिक संस्थानों का एकमात्र उद्देश्य पाठ्यक्रम को समाप्त करवाना भर रह गया है? क्या शिक्षकों का, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व नहीं है कि वे अपने यहाँ पढ़ने वाले बच्चों को सजगता, सतर्कता, सुरक्षा के बारे में जागरूक करें?  क्या पारिवारिक स्तर पर बच्चों को संयमित रहने, अनुशासित रहने के बारे में नहीं बताया जा सकता है?

स्कूल यूनिफार्म में तेज गति से बाइक दौड़ाते बच्चे दिखना आम बात है. किसी को भी ऐसे दृश्य देखकर अब आश्चर्य नहीं होता है. तेज गति से फर्राटा भरती बाइक, बिना हेलमेट के चलाई जाती बाइक, तीन-तीन लोगों का बाइक पर जमे होना किसी के लिए आपत्ति का कारक नहीं बनता है. एक तो लोगों द्वारा ऐसे नियम विरुद्ध कार्यों पर रोक-टोक नहीं की जा रही है और यदि की भी जा रही है तो इन बच्चों द्वारा उस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. नियमानुसार स्कूल में पढ़ रहे बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बन सकता है. ऐसे में विडम्बना यह है कि ऐसे बच्चों को न तो घर-परिवार में रोका जाता है और न ही सड़क पर यातायात पुलिस के द्वारा उनको प्रतिबंधित किया जाता है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि स्कूल के बच्चे को बाइक किसी घर से ही मिली होगी. चाहे वो उसका अपना घर रहा हो अथवा उसके किसी दोस्त का. क्या उनके माता-पिता का दायित्व नहीं बनता है वे बच्चों को बाइक चलाने से रोकें. यहाँ दुर्घटना होने की स्थिति में प्रशासनिक लापरवाही से अधिक पारिवारिक लापरवाही का मामला सामने आता है. ऐसी कई-कई दुर्घटनाएँ नदियों, बाँधों, रेलवे ट्रेक, सड़क, आदि पर आये दिन दिखाई देती हैं.


प्रथम दृष्टया ऐसे मामलों में प्रशासन को दोषी ठहराया जा सकता है. किसी भी नागरिक की सुरक्षा का दायित्व प्रशासन का है. महज इतने भर से आम नागरिक अथवा परिवार भी अपने दायित्व से मुँह नहीं मोड़ सकता है. बच्चों को घर में, स्कूल में जागरूक किया जाना चाहिए. न केवल अपनी सुरक्षा वरन अन्य दूसरे नागरिकों की सुरक्षा के बारे में बताया जाना चाहिए. हमें समझना होगा कि प्रशासनिक तंत्र के पास नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ नागरिक-विकास के, समाज-विकास के अनेकानेक कार्य होते हैं. एक सामान्य अवधारणा में नागरिकों की संख्या की तुलना में सरकारी मशीनरी, प्रशासनिक तंत्र बहुत-बहुत छोटा और अत्यंत सीमित है. उसकी पहुँच प्रत्येक क्षेत्र में बना पाना न तो व्यावहारिक है और न ही सरल है. ऐसे में आम नागरिक की भी जिम्मेवारी बनती है कि वो समाज में प्रशासनिक भूमिका निर्वहन के लिए खुद को तैयार करे. जीवन कितना अनमोल है इसकी अहमियत बच्चों को, नौजवानों को बताये जाने की आवश्यकता है. ध्यान रखना चाहिए कि जिन बच्चों को देश की, समाज की आधारशिला रखनी है, उसका भविष्य बनना है उनका यूँ चले जाना किसी के हित में नहीं है. किसी भी बच्चे का, नौजवान का चले जाना जितना हानिकारक और दुखद एक परिवार के लिए है, उतना ही किसी समाज और देश के लिए भी है. यदि समाज का एक-एक नागरिक, माता-पिता, शिक्षक स्वयं को प्रशासन का अंग मानकर बच्चों को सचेत करने का कार्य करें, बच्चों को अनुशासित करने का दायित्व निभाएं, बच्चों को जीवन की महत्ता के बारे में समझाएँ तो आये दिन बच्चों की लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है. बच्चों को असमय मौत के आगोश में जाने से रोका जा सकता है. परिवार, समाज, देश की अमूल्य क्षति को रोका जा सकता है.  

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चित्र गूगल छवियों से साभार 

4 comments:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 24/06/2016 को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

HARSHVARDHAN said...

आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति रानी दुर्गावती और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

Kavita Rawat said...

बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति