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07 March 2016

लोकतान्त्रिक मूल्यों को खतरा



किसी भी देश के विकास हेतु वहाँ सशक्त लोकतान्त्रिक मूल्यों का, सक्रिय राजनैतिक माहौल का, जागरूक राजनीतिज्ञों का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है. इन तत्त्वों के बिना देश के, समाज के विकास की संकल्पना बेबुनियाद लगती है. देश की आज़ादी के बाद संविधान निर्माताओं ने, लोकतान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करने वालों ने, देश के आम इंसान को भी राजनैतिक रूप से भागीदारी करने के उद्देश्य से ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया था जहाँ इंसान इंसान में भेद नहीं किया गया था. अधिकारों, दायित्वों, कर्तव्यों के लिए संवैधानिक रूप से यथोचित ध्यान तत्कालीन लोगों द्वारा दिया गया था. आज़ादी के तुरंत बाद संविधान निर्माण का कार्य, संवैधानिक व्यवस्था बनाये जाने का काम, देश में लोकतान्त्रिक मूल्यों, लोकतान्त्रिक ढाँचे को स्थापित करने का काम कुछ विशेष लोगों के कन्धों पर ही था और उन लोगों ने बिना किसी स्वार्थ के जनतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाया. ऐसे में सोचा जा सकता है कि तत्कालीन लोगों के मन-मष्तिष्क में देशहित की, जनहित की भावना किस गहराई से स्थापित होगी कि बिना किसी स्वार्थलिप्सा के उन्होंने अधिकारों का वितरण देश के नागरिकों के बीच कर दिया. राष्ट्रीय स्तर पर हो अथवा प्रादेशिक स्तर पर, उनके द्वारा सदन की व्यवस्था इस तरह से की गई, जिसमें साधारण से साधारण इंसान को भी राजनैतिक सहभागिता करने का अवसर प्राप्त हो सके. लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की सफलता के लिए आवश्यक माना जाता है कि किसी भी देश के सभी नागरिक राजनैतिक रूप से अपनी सक्रियता प्रदर्शित करें. 

इसी सकारात्मक मानसिकता के चलते ही संवैधानिक मूल्यों के निर्माताओं ने बिना किसी भेदभाव के तृणमूल स्तर तक के व्यक्ति तक को राजनैतिक अधिकार दे रखे थे. किसी भी व्यक्ति को धर्म, जाति, आर्थिक, शैक्षिक, क्षेत्र, लिंग आदि के आधार पर निर्वाचन प्रक्रिया से अलग नहीं रखा गया था. सर्वाधिक शिक्षित को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार दिया गया तो निरक्षर को भी लोकतान्त्रिक मूल्यों के सशक्त बनाने में सहायक बनाया गया; सर्वाधिक अमीर व्यक्ति को भी जहाँ राजनैतिक रूप से भागीदारी करने का अवसर दिया गया वहीं नितांत गरीब को भी इस प्रक्रिया से अलग नहीं किया गया. संवैधानिक मूल्यों, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के रचनाकारों, निर्माताओं की इस निस्वार्थ सोच का सुखद परिणाम रहा कि एक-एक व्यक्ति को देश में लोकतान्त्रिक ढाँचे का अंग माना-समझा गया. ये सोचकर अपने आप ही उन विभूतियों की मानसिकता पर गर्व होता है कि निस्वार्थ भाव से वे समस्त अधिकारों, दायित्वों, कर्तव्यों का वितरण आम आदमी के बीच करते गए. वे चाहते तो देश के प्रमुख संवैधानिक पदों के लिए पारिवारिक व्यवस्था का निर्माण कर सकते थे. वे चाहते तो विरासतन व्यवस्था के द्वारा संवैधानिक पदों को आजीवन अपने नियंत्रण में कर सकते थे. वे चाह लेते तो लोकतान्त्रिक प्रकिया को अपने ढंग से संचालित करने का कोई सूत्र निर्माण कर लेते. सर्वाधिकार सुरक्षित होने के बाद भी, स्वतंत्र तरीके से संविधान निर्माण के बाद भी तत्कालीन लोगों ने अपने अथवा अपने परिवार के लिए किसी विशेष लाभ की सुविधा नहीं ली, ऐसी किसी व्यवस्था का निर्माण नहीं किया. 

समय परिवर्तित होता रहा. संवैधानिक मूल्यों में भले ही परिवर्तन न हुआ हो किन्तु लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलने लगे. निर्वाचन से लेकर सरकार गठन तक की प्रक्रिया में परिवारवाद, स्वार्थ, निजी हित दिखाई देने लगे. संविधान की मूल आत्मा के साथ खिलवाड़ करते हुए धनबल, बाहुबल से आम नागरिक को समूची प्रक्रिया से दूर किया जाने लगा. बेतहाशा बढ़ते धन ने, निरंकुश तरीके से सामने आते बहुबल ने साम, दाम, दंड, भेद जैसी स्थितियों में दाम और दंड जैसी व्यवस्था को सहज स्वीकार्य बना दिया. स्वस्थ प्रतियोगिता के स्थान पर हिंसक राजनीति ने अपना विकराल रूप प्रदर्शित किया. सत्ता स्वार्थ में न केवल संविधान को, संवैधानिक मूल्यों को, लोकतान्त्रिक ढाँचे को ही विखंडित करने का कार्य नहीं किया गया बल्कि राष्ट्र की बर्बादी करने वालों को आदर्श बनाया जाने लगा. किसी समय में हाशिये पर खड़े व्यक्ति को लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की मुख्य धारा में शामिल किये जाने की सोच के साथ लागू आरक्षण व्यवस्था को अपना अधिकार समझा जाने लगा. इस कथित अधिकार की प्राप्ति हेतु राष्ट्रीय संपत्ति, सार्वजनिक संपत्ति, निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाने लगा. सामाजिक दृष्टि से, नागरिक हितार्थ दृष्टि से, देशहित में विचारणीय स्थिति है. सत्तालोलुप होने के चलते अब राजनैतिक गठबंधन ही नहीं हो रहे वरन राजनैतिक हत्याएँ तक की जाने लगी हैं तो समझा जा सकता है कि देश का भावी लोकतंत्र किस तरह कमजोर हो रहा है. जब देश में आतंकियों को आदर्श माना जाने लगा हो, उनके समर्थन में संगठित रूप से खड़ा होने लगा जाये, देशहितों को ताक पर रखते हुए विदेशी ताकतों के साथ आवाज़ मिलानी शुरू कर दी जाये तो समझा जा सकता है कि लोकतंत्र खतरे में है.
 

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