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04 December 2015

सहिष्णुता-असहिष्णुता से इतर भी सोच लो


संविधान दिवस के साथ आरम्भ हुआ संसद सत्र सहिष्णुता, असहिष्णुता के बने-बनाये दुश्चक्र में फँसता दिखाई दे रहा है. कितनी विडम्बना है कि भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय सत्ता में आते ही, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में एकाएक असहिष्णुता बढ़ने लगी. समस्त गैर-भाजपाई दलों को देश में असहिष्णुता का वातावरण निर्मित होता दिखाई देने लगा. कई-कई वरिष्ठ साहित्यकारों को भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा दिखाई दिया और उनके द्वारा पुरस्कार वापसी होने लगी. भारतीय जनता द्वारा सर आँखों पर बैठाये गए शाहरुक, आमिर जैसों को भी देश में रहने में खतरा दिखाई देने लगा. इन सबके द्वारा समवेत रूप से इस तरह का माहौल बनाया जाने लगा जैसे कि आज़ादी के बाद के कालखंडों में सबसे वीभत्स कालखंड भाजपा के सत्ता में आने के बाद आया. छोटे से छोटे बयान को, छोटी से छोटी घटना को मीडिया द्वारा भी इस तरह बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया मानो सहिष्णुता की जानबूझकर हत्या की जा रही हो.
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आये दिन किसी न किसी रूप में देश में असहिष्णुता के बढ़ने की घोषणा सी करके नामचीन लोगों द्वारा आम नागरिकों में अप्रत्यक्ष रूप से भय का वातावरण व्याप्त किया जा रहा है. यहाँ सहिष्णुता और असहिष्णुता पर संसद में चर्चा से पहले उसको समझने की आवश्यकता है. सहिष्णुता और असहिष्णुता को आम नागरिक के सामने परिभाषित कैसे किया जाये, किसे सहिष्णुता माना जाये और किसे असहिष्णुता समझा जाए ये आज अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. शाब्दिक रूप से इनके अर्थ को समझा जाये तो स्पष्ट है कि किसी की सहनशीलता को सहिष्णुता और असहनशीलता को असहिष्णुता के रूप में जाना-समझा जाता है. अब ऐसे में विचार किये जाने की आवश्यकता है कि आखिर किसी की सहनशीलता कब और किन अवसरों पर असहनशीलता में परिवर्तित होती है? ये भी जानने की आवश्यकता है कि किसी भी व्यक्ति, संस्था, संगठन आदि की सहनशीलता को जानने का पैमाना क्या हो? समाज में सहनशीलता का, सहिष्णुता का मानक निर्धारण क्या है और कितना है? किस मानक तक किसी व्यवहार को सहिष्णु माना जाये और किस मानक को पार करने के बाद उसी के व्यवहार को असहिष्णु माना जाये? बिना किसी दुराग्रह के देखा जाये तो स्पष्ट है कि सहिष्णुता का भावार्थ यही है कि आपको सामने वाले के व्यवहार को सहन करते रहना है. जैसे ही आपने उसके किसी भी व्यवहार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की तो आप असहिष्णु साबित हो जाते हैं. कितना हास्यास्पद है ये मन बैठना कि एक व्यक्ति अथवा समूह दूसरे व्यक्ति अथवा समूह के समस्त व्यवहार को नितांत निरपेक्ष भाव से सहन करता हुआ सहिष्णुता को बनाये, बचाए रखेगा.
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देश में विगत एक-डेढ़ वर्षों में जिन-जिन घटनाओं को आधार बनाकर असहिष्णुता बढ़ने का आरोप लगाया जा रहा है वो नितांत कपोल-कल्पित है. एकबारगी को यदि इन्हीं घटनाओं को सहिष्णुता, असहिष्णुता का आधार मान लिया जाये तो इन एक-डेढ़ वर्षों के पहले के शासनकाल में घनघोर असहिष्णुता देश में व्याप्त थी. यहाँ किसी भी रूप में किसी भी कालखंड में हुए दुष्कर्मों का, वारदातों का, जघन्य अपराधों का समर्थन करना उद्देश्य नहीं है वरन महज इसको समझाने का मंतव्य है कि सहिष्णुता में जिस तरह से सामने वाले द्वारा किसी भी तरह का व्यवहार किये जाने की आज़ादी छिपी होती है, वो भी अपने आपमें असहिष्णुता है. आखिर ऐसा मानकर क्यों चला जाता है कि एक पक्ष कुछ भी व्यवहार करता रहे और दूसरा पक्ष ख़ामोशी से सबकुछ सहन करता रहे? समाज में सदैव से संतोषम परम सुखम की जो घुट्टी व्यक्ति को बचपन से पिलाई जाने लगती है वो न केवल आतंरिक सुरक्षा-शांति में अपितु राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी घातक सिद्ध होती है. यही कारण है कि हम एक तरफ उन आतंरिक ताकतों से लड़ रहे हैं जो किसी भी रूप में देश को अशांत घोषित कर देना चाहती हैं, साथ ही उन बाहरी ताकतों से भी लड़ने में लगे हैं जो चाहती हैं कि देश कमजोर होकर पुनः गुलामी का दंश झेलने लगे. ऐसे नाजुक मौके पर न केवल राष्ट्रीय, क्षेत्रीय राजनैतिक दलों को वरन आम नागरिकों को भी संगठित रूप से मंथन करने की आवश्यकता है. देश को सहिष्णुता, असहिष्णुता की अनर्गल बहस से कहीं आगे ले जाकर स्वतंत्र, व्यापक, समृद्ध, विकासपरक मोर्चे पर स्थापित करना है. सभी को समझने की आवश्यकता है कि देश का विकसित स्वरूप ही नागरिकों के विकास का आधार निर्मित करता है.

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