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07 November 2015

सहिष्णु बने रहने का अर्थ ज्यादती सहते रहना

देश में साहित्यकारों सहित अनेक लोगों को पुरस्कार/सम्मान वापस करते देखकर एहसास हुआ कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है. यहाँ समझने वाली बात ये है कि असहिष्णुता यदि बढ़ी है तो पहले से देश में व्याप्त थी, तभी तो बढ़ी है, यदि पहले से अस्तित्व में न होती तो क्या बढ़ती. अब इस पर फिर से विचार किया जाना चाहिए कि जब पहले से असहिष्णुता थी तो किसके शासन में पैदा हुई और किसने इसे पैदा किया? यदि उसी समय उसके पैदा होते ही उसको समाप्त कर दिया गया होता तो शायद आज इतनी ज्यादा न बढ़ी होती और न ही साहित्यकारों सहित अनेक लोगों के लिए बवाले-जान बनती. दरअसल देश में सहिष्णुता, असहिष्णुता के मायने कभी कायदे से समझाए ही नहीं गए. महात्मा गाँधी के ‘एक गाल पर तमाचा खाने के बाद दूसरा गाल कर दो’ के सिद्धांत के चलते सहिष्णुता या सहनशीलता को सार्वभौमिक माना जाने लगा. इसके चलते स्वीकार कर लिया गया कि सामने वाला किसी भी हद तक बदतमीजी दिखाए, दुर्व्यवहार करे, अपमान करे किन्तु उसके प्रति सहिष्णु बने रहना है, सहिष्णुता दर्शाना है, सहनशीलता दिखाना है. यदि ऐसा न किया जा सका तो समाज के सामने दुर्व्यवहार सह रहा, अपमान सह रहा, बदतमीजी सह रहा व्यक्ति असहिष्णु हो जायेगा, असहिष्णुता को बढ़ावा देने लगेगा. स्पष्ट है कि यदि आप अपमान सहने का, बदतमीजी सहने का, दुर्व्यवहार सहने का माद्दा नहीं रखते हैं तो आप असहिष्णु हैं और इसके प्रतिरोध में आप कोई भी कदम उठाते हैं तो वे असहिष्णुता को बढ़ाते हैं, सहिष्णुता को कमजोर करते हैं.
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इसके अलावा एक विशेष बात गौर करने वाली ये है कि पुरस्कार लौटाता वर्ग जिस असहिष्णुता की बात करने में लगा है, उसमें सहिष्णुता के पीछे अपने आप एक तरह की ज्यादती, दुर्व्यवहार छिपा हुआ है. सम्मान वापस करते लोगों ने असहिष्णुता बढ़ने का आधार बनाया है साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और इखलाक की हत्याओं को. यदि इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि का अध्ययन कर लिए जाये तो सहजता से ज्ञात होता है कि इन सभी के कृत्यों में कहीं न कहीं एक किसी वर्ग विशेष के लिए नफरत, दुष्प्रचार आदि की भावना छिपी हुई थी. हालाँकि इसमें कोई दोराय नहीं कि कोई भी इस बात का समर्थन नहीं करेगा कि किसी भी ज्यादती का प्रतिरोध किसी की हत्या नहीं होती है तथापि इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बार-बार की नफरत, बार-बार के दुर्व्यवहार, बार-बार के अपमान के चलते कभी-कभी व्यक्ति उग्र स्वरूप अपना लेता है. संभवतः ऐसे हालातों में कुछ उपद्रवी तत्त्वों द्वारा, आपराधिक प्रवृत्ति वालों द्वारा कुत्सित मानसिकता अपनाकर आपराधिक कृत्य कर दिया गया. आखिर कभी ये समझाने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि सहनशीलता कब अपनाई जानी है? किसी व्यक्ति, वर्ग, समाज के सामने कौन-कौन से हालात उत्पन्न हों कि वो अपनी सहिष्णुता को त्यागकर असहिष्णु हो जाए? किसी घर में चोरी करने वाले चोर को मात्र इसलिए छोड़ दिया जाये कि असहिष्णुता न बढ़ जाए? क्या किसी आपराधिक व्यक्ति को महज इसलिए छोड़ दिया जाये कि सहिष्णुता दिखानी है? किसी महिला के साथ शारीरिक दुराचार करते व्यक्ति को महज इस कारण छोड़ दिया जाना चाहिए कि कहीं समाज में असहिष्णुता न बढ़ने लगे? ऐसे ही अनेक सवालों के आलोक में पुरस्कार/सम्मान वापस करते लोग बताएँगे कि आखिर सहिष्णुता/असहिष्णुता का वास्तविक आधार क्या हो?

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यदि कला के नाम पर देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनाये जाएँ और विरोध न किया जाये तो सहिष्णुता; यदि अन्धविश्वास दूर करने के नाम पर देवी-देवताओं की मूर्तियों पर पेशाब करने की बात की जाये और कोई कुछ न कहें तो सहिष्णुता; यदि धार्मिक भावनाओं के प्रभावित होने के नाम पर मंदिरों से लाउडस्पीकर उतरवा लिए जाएँ और अन्य वर्ग के धार्मिक कृत्य का शोर लगातार उठता रहे और कुछ न बोला जाये तो सहिष्णु माना जायेगा; यदि अपने आपको आधुनिक बताने के नाम पर बीफ पार्टियों जैसे कृत्य खुलेआम, सार्वजानिक रूप से किये जाएँ और सब कुछ शांत होकर देखा जाये तो सहिष्णुता बनी रहती है; मीटिंग करने के नाम पर शहीद स्मारक से तोड़फोड़ की जाती है मगर कोई कुछ न बोलता है तो वहाँ सहिष्णुता जन्म लेती है; एक राष्ट्र के नाम पर खुलेआम कत्लेआम होता है, आतंकवाद फैलाया जाता है और कोई आवाज़ न उठाये तो सहिष्णु समझा जाता है किन्तु जैसे ही इसमें से किसी भी या सभी कृत्यों के खिलाफ आवाज़ उठानी शुरू कर दी जाती है तो देश में असहिष्णुता बढ़ने लगती है; लोग असहिष्णु होने लगते हैं; देश का वातावरण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए नहीं रह जाता है. इसका सीधा सा तात्पर्य ये है कि असहिष्णुता का अर्थ तो यही हुआ कि हमने सहनशीलता की सीमारेखा को पार कर लिया है. आखिर ऐसा मौका ही क्यों दिया जाए कि किसी को सहनशीलता की सीमा पार करनी पड़ जाए? सोचो...!!
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