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25 May 2015

सोशल मीडिया की स्वतन्त्रता और भेदिया बनते हम

दिन प्रतिदिन सोशल मीडिया अपना विस्तार करता हुआ तेजी से आमजन के बीच पैठ बनाता जा रहा है। इसके माध्यम से अपने भावों की, अपने विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होने के कारण भी इसे लोगों द्वारा पसंद किया जा रहा है। अपनी इस विशिष्टता के कारण सोशल मीडिया ने वैचारिकी को प्रमुखता दी और लोगों को मुखर बनाया। यही कारण है कि किसी समय विचारों के प्रसारण हेतु लोगों को मंच की तलाश रहती थी, जो आज समाप्त हो गई है। अब न किसी संस्थान की जरूरत, न किसी सम्पादक की मनमर्जी का सवाल, न विचारों पर किसी तरह के प्रतिबंध का डर। अब व्यक्ति पूरी स्वतन्त्रता के साथ अपने विचारों का प्रकटीकरण कर रहा है। अब उसके सामने किसी तरह का अवरोधक नहीं है। अब उसे अपने विचारों के प्रकाशन हेतु किसी तरह का इंतजार नहीं करना पड़ रहा है। एक व्यक्ति पूरी तन्मयता से अपनी वैचारिकी का प्रदर्शन करते हुए अपने लिए नवीन क्षितिज तलाश रहा है। विचार स्वतन्त्रता के इस दौर में ऐसे मंचों ने जहाँ किसी व्यक्ति को असीमित आसमान देकर सम्भावनाओं के नये द्वार खोले हैं, वहीं निर्द्वन्द्व रूप से एक तरह का घातक हथियार भी थमा दिया है। 

सोशल मीडिया के स्वतन्त्र मंच ने अभिव्यक्ति को सहज, सरल बनाया तो लोगों ने अपनी रुचियों को स्थापित करने का रास्ता तलाशा। इसके चलते साहित्य, कला, संस्कृति, संगीत आदि से लोगों का सहज परिचय होने लगा। दुर्लभ सामग्रियों के सामने आने के बहाने मिले साथ ही लोगों ने अव्यवस्थाओं के विरुद्ध एकजुट होना शुरू किया। शासन, प्रशासन की अच्छाइयों को सराहा तो उनकी कमियों को भी दर्शाया। सरकार के कार्यों की प्रशंसा हुई तो उसकी बुराई भी की गई। ऐसे हालातों में सोशल मीडिया पर मिली स्वतन्त्रता अपने साथ एक अजब तरह की नकारात्मकता लेकर आई, जिसके साथ एक देशव्यापी खतरा भी साथ आता दिखा। लोगों द्वारा स्वतन्त्रता के अतिउत्साह में वैचारिकी के साथ-साथ इस तरह की कमियों को सामने रखना शुरू कर दिया जो किसी भी रूप में समाजहित में नहीं कही जा सकती। सरकार, शासन, प्रशासन से सम्बन्धित लोगों ने इधर-उधर से, गोपनीय ढंग से जानकारी लेकर उसको सोशल मीडिया पर प्रकट करने का कार्य किया। सरकारी आँकड़ों, खबरों को तोड़मरोड़ कर विकृत, भ्रामक रूप में प्रस्तुत किया गया। धर्म, जाति को आधार बनाकर अन्य दूसरे धर्मों, जातियों पर टिप्पणी करने का काम किया गया। समाज के किसी भी वर्ग की स्थिति, उसकी क्षमताओं, जीवनशैली, कार्यक्षमताओं आदि को लेकर भी नकारात्मकता दर्शायी गई। और तो और व्यक्तियों द्वारा अपने स्वयं के जीवन की अंतरंगता को सामने रखा गया, पति-पत्नी के बीच की गोपनीयता को  सार्वजनिक किया गया, रिश्तों की मर्यादा को भूल उन्हें कलंकित करने का कार्य किया गया। एकबारगी को ये सारा काम सक्रियता का सूचक समझ आता हो, भले ही ये सब व्यक्तियों की जागरूकता का पैमाना समझा जा रहा हो, हो सकता है इसे तकनीकी विकास की स्वतन्त्रता का मानक समझ लिया गया हो किन्तु जानकारी के स्तर पर, सूचनाओं के स्तर पर यह किसी खतरे से कम नहीं है। 

हो सकता है कि बहुत से लोगों को ये कपोलकल्पना जैसा लगे किन्तु यदि गम्भीरता से समूची बात को समझा जाये तो एहसास होगा कि किस तरह हम अनजाने अपने देश की, अपने शासन की, अपने समाज की, अपने परिवार की, अपने आपकी सूचनाओं को विदेशी हाथों में सहजता से पहुँचा रहे हैं। शायद हम सभी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित होंगे कि सोशल मीडिया के ऐसे तमाम मंचों का संचालन विदेश से ही हो रहा है। सम्भव है कि उनके द्वारा उनके तमाम उपभोक्ताओं का कोई डाटाबैंक गोपनीय रूप से तैयार किया जा रहा हो, जिसका कि वे स्वार्थ हेतु अध्ययन कर रहे हों। सोशल मीडिया पर पोस्ट किसी भी सामग्री को विदेशी प्रस्तोता अपने ढंग से प्रयोग कर सम्बन्धित समाज की जानकारी हासिल कर लेता हो। हम सब मुफ्त मिली स्वतन्त्रता और मुफ्त मिले मंच के द्वारा अनायास ही चित्रों, विचारों, तथ्यों द्वारा जानकारी, सूचना आदि विदेशियों को उपलब्ध कराते जा रहे हैं। किसी भी समाज, किसी भी देश, किसी भी व्यक्ति, किसी भी सरकार को कमजोर साबित करना हो, उसे परास्त करना हो तो उससे सम्बन्धित समस्त सूचनाएँ, जानकारियाँ एकत्र कर लेनी चाहिए। सोचने वाली बात है कि कहीं सोशल मीडिया के द्वारा विदेशी देश ऐसा ही तो नहीं कर रहे? कहीं हम सब विचाराभिव्यक्ति के अतिउत्साह में स्वयं ही तो सभी सूचनाएँ, जानकारियाँ विदेश तो नहीं भेजे दे रहे? सोशल मीडिया पर मिली निर्बाध स्वतन्त्रता के पीछे कारण कुछ भी हो किन्तु हम सभी को ये विचार करना होगा कि सबकुछ पोस्ट कर देने, प्रचारित कर देने की लालसा में हम विदेशों के लिए जासूसी तो नहीं किए जा रहे? सजग होना, सजग रहना  आज के  दौर में अत्यावश्यक है, इस तथ्य को समझने की जरूरत है।

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