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11 March 2015

कानूनी प्रक्रिया में विलम्ब से उत्पन्न जनाक्रोश


नागालैंड में भीड़ द्वारा एक बलात्कारी को जेल से बाहर निकाल कर सरेआम उसकी हत्या कर चौराहे पर लाश लटकाने की घटना से देश भर में न्याय-प्रक्रिया को लेकर, बलात्कार के आरोपियों की सजा को लेकर, सजा सुनाये जाने की समयावधि को लेकर बहस छिड़ गई है. इस घटना के ठीक पूर्व एक मीडिया संस्थान की दिल्ली बलात्कार कांड से सम्बंधित डॉक्युमेंट्री ने भी एक तरह की बहस शुरू हुई. सवाल देश में शुरू होने वाली बहसों का नहीं वरन उन बहसों, तर्क-वितर्कों से निकलने वाले परिणामों को लेकर खड़ा होता है. आखिर इस तरह की बहस से मिलता क्या है, निकलता क्या है? दिल्ली बलात्कार कांड के बाद देशव्यापी आन्दोलन ने भी कानूनी प्रक्रिया, बलात्कार दोषियों की सजा के सम्बन्ध में कानूनी सुधार हेतु बहस को जन्म दिया था किन्तु उसके भी अपेक्षित परिणाम सामने आते नहीं दिखे हैं. बलात्कार उसके बाद भी और तीव्र गति से होते दिखने लगे हैं; महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ और तीव्रता पकड़ गईं लगती हैं; लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार और उनकी हत्याएँ किये जाने की वारदातों में किसी भी तरह की कमी नहीं आ सकी है. ऐसे में किसी भी कानूनी सुधार का क्या अर्थ निकलता है, किसी भी देशव्यापी बहस का क्या अर्थ रह जाता है?
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नागालैंड की घटना को कानूनी अथवा सामाजिक रूप से भले ही सही न ठहराया जा सके किन्तु इस घटना ने सोचने पर मजबूर अवश्य ही किया है कि यदि कानूनी प्रक्रिया में विलम्ब होता रहेगा तो एक न एक दिन जनता स्वयं ही इस तरह के फैसले लेने को मजबूर हो जाएगी. देश भर में यहाँ तक कि विदेशों तक में छाये रहे दिल्ली बलात्कार काण्ड की चर्चा करें तो पकड़े गए आरोपी स्पष्ट रूप से दोषी पाए गए हैं. पकड़ने से लेकर सजा निर्धारण तक की स्थिति में ये समझ से परे है कि आखिर सबूत, गवाह, तारीखों आदि का क्या मकसद रहा था? इतने जघन्य काण्ड के बाद भी सजा में देरी क्यों हुई? हाँ, उन घटनाओं में जहाँ कि सबूतों, गवाहों की आवश्यकता हो; पकड़े गए आरोपियों की पहचान का संकट हो वहाँ तो कानूनी प्रक्रिया का लम्बा खिंचना समझ आता है किन्तु निरर्थक रूप से किसी भी मामले को लम्बा घसीटना जनता में विद्रोह को ही जन्म देता है.
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दिल्ली कांड पर बनी डॉक्युमेंट्री को भले ही सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया हो किन्तु इंटरनेट के ज़माने से उसके प्रचार-प्रसार को रोक पाना नामुमकिन ही है. सोचने की बात ये है कि नागालैंड की घटना की तर्ज़ पर, डॉक्युमेंट्री से आक्रोशित होकर जनता ने कुछ वैसा ही कदम इन आरोपियों के लिए उठा लिया तो क्या होगा? ऐसे एक-दो नहीं कई-कई विवादित मामले ऐसे हैं जिनके सन्दर्भ में अनावश्यक रूप से देरी की जा रही है. मामले की गंभीरता को जानते-समझते हुए भी विलम्ब करना कहाँ का इंसाफ है, कैसा न्याय है इसे कानूनविद ही भली-भांति जानते होंगे.

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2 comments:

ब्लॉग - चिट्ठा said...

आपको बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में चिट्ठा फीड्स एग्रीगेटर की शुरुआत आज से हुई है। जिसमें आपके ब्लॉग और चिट्ठे को भी फीड किया गया है। सादर … धन्यवाद।।

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