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12 February 2015

कहीं महिला-विहीन न हो जाये समाज



‘गर्भ में मात्र दस सप्ताह की मासूम बालिका. माँ की कोख में उसकी सामान्य हलचलों को देखा जा सकता है. दिल की धड़कन सामान्य रूप से चल रही है, तभी किसी अंदेशे से मासूम बालिका अपने में सिमट जाती है. एक औजार बच्ची के अंग काट-काट कर उसके अस्तित्व को मिटा रहा है. बच्ची मुँह खोलने की कोशिश कर रही है, उसके दिल की धड़कन दो सौ की सीमा तक पहुँच चुकी है लेकिन इन सबसे इतर वह यंत्र गर्भस्थ बच्ची के टुकड़े-टुकड़े कर मात्र पंद्रह मिनट में उसका अस्तित्व जन्म से पूर्व ही समाप्त कर देता है.’ ये कोई फ़िल्मी विज्ञान पटकथा का सीन न होकर वास्तविक जीवन की सच्चाई है, अल्ट्रासाउंड मूवी का दृश्य है, जिसे महज कौतूहलवश गर्भपात कर रहे चिकित्सक बर्नाड नैथेन्स ने बनवाया था. इस फिल्म को देख अनेकानेक गर्भपात कर चुके उस चिकित्सक के भी रोंगटे खड़े हो गए और इस सत्य को ‘साइलेंट स्क्रीम’ (मूक चीख) नाम देकर उसने सदा-सदा को चिकित्सा क्षेत्र का त्याग कर दिया. ये वास्तविक फ़िल्मी दृश्य भले ही सन 1984 का हो किन्तु ये स्थिति आज भी हमारे समाज में और अधिक वीभत्स रूप में मौजूद है. गर्भ में कन्या भ्रूण हत्या की समस्या एकाएक उपजी समस्या नहीं है. लगभग 85 वर्ष पूर्व हिन्दी साहित्य प्रेस द्वारा शीतला सहाय की पुस्तक ‘शिशु हत्या तथा परमेध प्रथा’ को प्रकाशित किया गया था, जिसमें इस बेरहम प्रथा का जिक्र किया गया था. वैसे इतिहास इससे भी कहीं और अधिक समय पहले से कन्याओं को मारे जाने के प्रमाण अपने में कैद किये हुए है. 

महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की घटनाओं के साथ-साथ बेटियों की हत्याओं का अपना क्या इतिहास रहा है, क्या कारण रहे हैं  वह एक अलग विषय है. वर्तमान अतीत की तरह भयावह नहीं है, परिणामस्वरूप इस जघन्य कृत्य पर विचार किया जाना अत्यावश्यक है. हमारा भविष्य कैसा होगा ये वर्तमान पर ही निर्भर करेगा. यदि वर्तमान का चित्र आँकड़ों के आईने में देखें तो स्थितियाँ कहीं से भी सुखद प्रतीत नहीं होती हैं. यहाँ हम इस समस्या को देखें तो स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि 2011 की जनगणना में बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया कि 2001 की जनगणना की तुलना में 2011 में महिलाओं की संख्या बढ़ी है. यह सत्य भी दिखता है क्योंकि 2001 में प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 933 थी जो 2011 में बढ़कर 940 तक जा पहुँची. यह आँकड़ा एक पल को भले ही प्रसन्न करता हो किन्तु इसके पीछे छिपे कड़वे सत्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. 2001 की जनगणना में छह वर्ष तक की बच्चियों की संख्या 927 (प्रति हजार पुरुषों पर) थी जो 2011 में घटकर 914 रह गई है. यही वो आँकड़ा है जो हमें महिलाओं की बढ़ी हुई संख्या पर प्रसन्न होने की अनुमति नहीं देता है. सोचने की बात है कि जब इस आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी है तो महिलाओं की संख्या में इस वृद्धि का कारण क्या रहा? यदि 2011 की जनगणना के आँकड़े बच्चियों के संदर्भ में देखें तो उनके भविष्य के प्रति एक शंका हमें दिखाई देती है. 2001 की जनगणना में जहाँ देश के 29 राज्यों में शून्य से छह वर्ष तक की आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या 900 से अधिक थी वहीं 2011 में ऐसे राज्यों की संख्या 25 रह गई. राज्यों में बच्चियों के प्रति सजगता की स्थिति यह रही कि मात्र आठ राज्य ही ऐसे रहे जिनमें बच्चियों की संख्या में 2001 के मुकाबले 2011 में वृद्धि देखने को मिली. इनमें भी चार राज्यों में बच्चियों की संख्या 900 की संख्या को छू भी नहीं पाई. पंजाब (798 से 846), चंडीगढ़ (845 से 867), हरियाणा (819 से 830), हिमाचल प्रदेश (896 से 906), अंडमान-निकाबार (957 से 966), मिजोरम (964 से 971), तमिलनाडु (942 से 946) तथा गुजरात (883 से 886) में ही वृद्धि देखने को मिली शेष सभी राज्यों में शिशु लिंगानुपात में कमी ही देखने को मिली है. बालिकाओं की जनसंख्या के ये आँकड़े हमें किसी भी रूप में सुखद एहसास नहीं कराते हैं, यहाँ हमें ये ध्यान रखना होगा कि यही बेटियाँ भविष्य की माताएँ हैं. 

कितना हास्यास्पद लगता है कि एक तरफ इसी समाज में नवरात्रि पर कन्याओं का पूजन किया जाता है, कन्या-भोज किया जाता है और दूसरी तरफ कन्याओं को गर्भ में ही मारा जाता है. ये दुखद है और उससे ज्यादा दुखद है हमारा अमानवीय रूप से असंवेदनशील होना. समाज में पुत्रों की लालसा, मोक्ष प्राप्ति, अंतिम संस्कार की मानसिकता, पुत्री के विवाह में भारी-भरकम दहेज़ की व्यवस्था करना, बेटी के जन्म को क़र्ज़ जैसा समझने की कुप्रवृत्ति आदि के चलते गर्भपात को बढ़ावा मिला है. ऐसी स्थितियाँ तब हैं जबकि सरकार की तरफ से लगातार कानून बनाये जा रहे हैं, लोगों को सरकारी, गैर-सरकारी तौर पर जागरूक किया जा रहा है. दरअसल समाज में कानून की आड़ लेकर ही कानून से खिलवाड़ करने की मानसिकता सदा से व्याप्त रही है. सरकार द्वारा पीसीपीएनडीटी अधिनियम के द्वारा इस तरह के प्रावधान किये हैं कि गर्भस्थ शिशु के लिंग की जाँच नहीं की जाएगी. ऐसा करना अथवा गर्भपात करवाना कानूनन अपराध माना जायेगा किन्तु इसी अधिनियम में कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के लिए प्रसव पूर्व जाँच की अनुमति मिल जाती है. इन उद्देश्यों में गुणसूत्रों की असमानता, आनुवांशिक, शारीरिक, लिंग सम्बन्धी बीमारियों, जन्मजात विकलांगता आदि को ज्ञात करना है किन्तु इसके साथ भी कुछ सुरक्षात्मक व्यवस्था की गई है. जैसा कि शिक्षित समाज में होता आया है, कानून की सहूलियतों का दुरूपयोग ही किया गया है, वैसा ही यहाँ भी हुआ. मेडिकल टर्मिनेशन एक्ट ऑफ़ प्रेगनेंसी (एमटीपी) 1971 में वर्णित प्रावधानों जैसे किसी पंजीकृत चिकित्सक द्वारा निर्देशित होने पर, गर्भवती स्त्री की जान को खतरा होने पर, गर्भस्थ शिशु के विकलांग होने की आशंका पर, बलात्कार के कारण गर्भ ठहरने पर, पति-पत्नी द्वारा अपनाये गर्भ निरोधक उपायों के असफल होने आदि स्थितियों में गर्भपात करवाया जा सकता है. यहाँ सवाल ये हैं कि पंजीकृत चिकित्सक के निर्देश को चुनौती कौन देगा? ये कौन निर्धारित करेगा कि पति-पत्नी द्वारा अपनाया गर्भ निरोधक उपाय असफल रहा? कानून के प्रभावी होने से पहले ही उसको निष्प्रभावी करने की रणनीति अपना ली जाती है. 

चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके. पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियाँ होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है. परिणामतः वह आने वाले समय में परिवार के लिए न तो पुत्र ही पैदा कर पाती है और न ही पुत्री. बार-बार गर्भपात करवाने से महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका बनी रहती है. इससे महिला के शरीर में खून की कमी हो जाती है और अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु इसी वजह से हो जाती है. इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियाँ जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है. उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है. इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं.

देखा जाये तो वर्तमान में कानूनी उपायों से ज्यादा सामाजिक जागरूकता ही प्रभावी होगी. लोगों का अपनी सोच को बदलना ही ज्यादा उपयुक्त होगा. पुत्र ही मोक्ष दिलाएगा, वंश-वृद्धि कराएगा जैसी पुरातनपंथी सोच को बदलने की जरूरत है. एक पुत्र की लालसा में कई-कई बेटियों को मौत की नींद सुला देना उचित नहीं. घर-परिवार के लोगों को समझाए जाने की आवश्यकता है, समाज की स्थापित महिलाओं को रोल-मॉडल बनाकर सामने लाने की आवश्यकता है. रानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी, किरण बेदी, कल्पना चावला आदि जैसी महिलाओं के बारे में बताये जाने की आवश्यकता है. कानूनी उपायों के साथ-साथ बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच को बचपन से ही जगाने की आवश्यकता है. संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से ऐसे नियमों, कानूनों आदि को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम बनाये जाने की जरूरत है. समाज को बताये जाने की जरूरत है कि समाज जब लिंगानुपात की समस्या को भोगेगा, स्त्रियों की संख्या में गिरावट को सहेगा तो उसका स्वरूप क्या होगा. 

हमारी वंश-वृद्धि के लिए बहुएँ कहाँ से आएँगी, पुत्र-जन्म के लिए माताएँ कहाँ से आएँगी, मुखाग्नि देने वाले बेटे किसकी कोख से पैदा होंगे? लिंगानुपात सम्बन्धी आँकड़ों की असलियत को ध्यान में रखकर इस स्थिति पर विचार करना ही होगा कि कहीं महिलाएँ इतिहास के पन्नों में ही दर्ज होकर न रह जाएँ. बेटियों का अपहरण किया जाना, गैंग-रेप, लड़कों का अविवाहित रह जाना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, यौन संक्रमण, यौन बीमारियों का फैलना आदि बुराइयाँ तो दिखने ही लगी हैं; ये हास्य का नहीं वरन सचेत होने का विषय है कि जिस गति से पुत्र-मोह का शिकार होकर समाज में कन्या भ्रूण हत्याएँ बढ़ती जा रही हैं उनसे कदाचित किसी दिन हमारा समाज महिला-विहीन न हो जाये. भविष्य में ऐसी भयावह स्थिति से दो-चार न होने के लिए हम सभी को वर्तमान में इस भीषण समस्या से दो-चार हाथ करने ही होंगे.
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उक्त आलेख जनसंदेश टाइम्स, १२ फरवरी २०१५ के अंक में सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है.

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