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05 January 2015

देश की शांति-सुरक्षा खतरे में



देश में राजनीतिक संज्ञा-शून्यता इस तरह हावी हो जाएगी, संभवतः किसी ने भी नहीं सोचा होगा. कराची से चली विस्फोटक भरी नाव के पोरबंदर पहुँचने से पूर्व पकड़ में आना, फिर उन आतंकियों का खुद को उड़ा लेना एक बहुत बड़े आतंकी हमले से देश को सुरक्षित कर गया किन्तु इसके बाद जिस तरह से राजनैतिक दलों की बयानबाजियाँ आनी शुरू हुई हैं वे तो संभावित आतंकी हमले से कहीं ज्यादा घातक लग रही हैं. ये अब किसी से भी छिपा नहीं रह गया है कि पाकिस्तान की तरफ से लगातार आतंकी गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं; ये भी सामने आ चुका है कि देश में आतंकी कार्यवाहियां करने वाले आतंकी पाकिस्तान में खुलेआम घुमते नज़र आ रहे हैं, इसके बाद भी देश के तमाम राजनैतिक दल और व्यक्तित्व सत्ता पक्ष को घेरने में लगे हुए हैं.
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इस बात से किसी को इंकार नहीं होना चाहिए कि मुस्लिम भी इसी देश का हिस्सा हैं और समय-समय पर उन्हों ने देश के विकास में अपना योगदान दिया है. भाजपा की वर्तमान विजय के पश्चात् और नरेन्द्र मोदी की भारतीय मुस्लिम जनमानस में बनती सकारात्मक छवि से वे सभी दल घबरा से गए हैं जिनकी राजनैतिक रोटियाँ आज भी मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर चल रही हैं. ऐसे दलों में अपने अस्तित्व को लेकर भय बनता जा रहा है और इसी कारण से समवेत रूप से सबके द्वारा इस नाव-काण्ड के बाद से भाजपा को घेरने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है. सभी दलों को कम से कम इस बात को समझने का प्रयास अवश्य करना चाहिए कि जहाँ बात विशुद्ध राजनीति की हो वहाँ किसी भी रूप में विपक्षी दलों को घेरने का काम होना चाहिए किन्तु जहाँ बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, जहाँ बात आतंकवाद से लड़ने की हो वहाँ सभी को एकजुट होकर ऐसी घटनाओं का विरोध करना चाहिए. इसके उलट मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए, उनके वोटों के लालच में इस्लामिक आतंकवाद जैसी वैश्वक अवधारणा के विरुद्ध कपोल-कल्पित भगवा आतंकवाद जैसी शब्दावली रच दी गई है.
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राजनैतिक दलों द्वारा किसी भी घटना पर सिर्फ और सिर्फ स्वार्थमय राजनीति करने का मौका तलाशे जाने की आदत को त्यागना होगा. समस्त गैर-भाजपाई दलों द्वारा किसी भी कदम पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने का कार्य बंद करना होगा. इससे न केवल देश को कमजोर करने वाली ताकतों के हौसले बुलंद होते हैं वरन वैश्विक स्तर पर देश की छवि भी धूमिल होती है. इसके अलावा न केवल देश के बाहर के आतंकी वरन देश के भीतर भी छिपे फिरकापरस्त अपने आपको और मजबूती से सामने लाते हैं. इन सबका खामियाजा न तो राजनैतिक दलों को भुगतना पड़ता है, न ही राजनेताओं को वरन इसके लिए देश का आम नागरिक ही कष्ट उठाता है. सभी दलों को आपसी मतभेद भुलाकर, सत्ता का लोभ-लालच बिसरा कर राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दों पर तो एकजुट होना ही पड़ेगा. यदि अतिशीघ्र ऐसा नहीं किया जाता है तो देश का राजनैतिक वातावरण तो बिगड़ेगा ही देश की शांति-सुरक्षा व्यवस्था, आम जनजीवन पर भी इसका नकारात्मक असर देखने को मिलेगा.  

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