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19 November 2014

व्यावहारिक प्रयासों से होगा पर्यावरण-संरक्षण



            वर्तमान में प्रदूषण के कारण पर्यावरण संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है अथवा पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी जागरूकता ने प्रदूषण अधिक फैलाना शुरू कर दिया है, ये अपने आपमें शोध का विषय हो सकता है. पर्यावरण-संकट हम इंसानों ने ही उत्पन्न किया है और वर्तमान में यह मानव समाज के सामने एक चुनौती के रूप में सामने आया है. विकास की जद्दोजहद में इन्सान ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों को विस्मृत सा कर दिया है और दुष्परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट सामने आया है. मानव ने आदिमानव से महामानव बनने के क्रम में प्रकृति को सर्वाधिक क्षतिग्रस्त किया है और बिना इस बात की परवाह किये कि उसकी संतति प्रकृति से क्या पाएगी. उसके लिए इसका कोई महत्त्व नहीं कि जिस पर्यावरण में वह साँस ले रहा है, जिस प्राकृतिक वातावरण में वह जीवनयापन कर रहा है उसको नष्ट कर देने से सर्वाधिक नुकसान वह स्वयं का ही कर रहा है.
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            सामान्य रूप से पर्यावरण का पारिभाषिक सन्दर्भ संस्कृत के परि उपसर्ग में आवरण शब्द को सम्बद्ध करने से लगाया जाता है अर्थात ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति, जीवधारी, वनस्पति आदि को चरों तरफ से आवृत्त किये हो. पर्यावरण के सामान्य अर्थ से इतर यदि इसका सन्दर्भ निकालने का प्रयास किया जाये तो ज्ञात होता है वर्तमान में जो कुछ भी ज्ञात-अज्ञात हम अपने आसपास देख-महसूस कर रहे हैं, वो सभी पर्यावरण है. हमारे आसपास, हमारे लिए जीवन की एक सम्पूर्ण व्यवस्था का निर्माण करता है, उसे हम पर्यावरण कहते हैं. इसमें सजीव-निर्जीव वस्तुएँ, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, हवा, पानी, मिट्टी, वनस्पति, सूर्य, चंद्रमा, तारे, धरती, आकाश आदि सभी समाहित किये जाते हैं. जल, धरती, आकाश, वायु आदि सभी के साथ वर्तमान में उसका व्यवहार दोस्ताना नहीं रह गया है वरन इनका अधिक से अधिक उपभोग करने की मानसिकता के साथ मनुष्य काम कर रहा है.
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            इन्सान के द्वारा विकास के नाम पर शनैः-शनैः प्रकृति को क्षतिग्रस्त करके पर्यावरण में असंतुलन पैदा किया जा रहा है. सुख-समृद्धि के लिए उठाये जा रहे अदूरदर्शी क़दमों के कारण प्रकृति में जबरदस्त असंतुलन देखने को मिल रहा है. ओजोन परत में छेद होना, ग्लेशियरों का पिघलना, अम्लीय वर्षा का होना, बेमौसम की बरसात का होना, बर्फ़बारी की घटनाएँ आदि इस असंतुलन का दुष्परिणाम हैं. जल, वायु, ध्वनि, मृदा आदि प्रदूषण से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन मानव जीवन के साथ-साथ वन्य प्राणियों के, वनस्पतियों को खतरा पैदा कर रहा है. कल-कारखानों से निकलने वाला धुआँ, वाहनों से निकलती कार्बन मोनो आक्साइड तथा अन्य जहरीली गैसें, बिजली ताप घर से निकलती सल्फर डाई आक्साइड, धूम्रपान से निकलता विषैला धुआँ, तथा अन्य रूप में वातावरण में मिलती निकोटिन, टार अमोनिया, बेंजापाईरिन, आर्सेनिक, फीनोल मार्श आदि जहरीली गैसें व्यक्तियों, जंतुओं, वनस्पतियों आदि को व्यापक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं. ऐसे में इनसे बचाव के तरीके, इनकी रोकथाम के प्रयासों, प्रदूषण को कम करने पर विचार, पर्यावरण संतुलन बनाये जाने सम्बन्धी प्रयासों, प्रदूषण दूर करने-कम करने संबंधी क़दमों आदि की चर्चा अत्यावश्यक तो है ही, उनको अमल में लाया जाना उससे भी ज्यादा आवश्यक है.
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            वर्तमान जीवनशैली को, व्यापारिक-वाणिज्यिक स्थिति को, कल-कारखानों-उद्योगों पर मानवीय उपलब्धता, मानवीय रहन-सहन के तौर-तरीकों आदि के चलते ये कल्पना ही लगता है कि सभी लोग पूर्णरूप से पर्यावरण संरक्षण हेतु प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं किन्तु ये कदापि असंभव नहीं कि एक-एक व्यक्ति खुद को सुधारने का काम कर ले तो पर्यावरण संकट को दूर न किया जा सके. पर्यावरण संकट से निपटने में सबसे बड़ी बाधा व्यक्ति का स्वयं के प्रति ईमानदार न होना ही है और जब तक इन्सान अपने प्रति ईमानदारी से कार्य नहीं करेगा, तब तक इस तरह के अत्यावश्यक कार्यों में समस्या उत्पन्न होती ही रहेगी. इस सम्बन्ध में फैलते वायु, जल, ध्वनि, मृदा प्रदूषण पर ही समाधानात्मक कदम उठा लिए जाएँ तो भले ही समस्या पूर्ण रूप से समाप्त न ही पर बहुत हद तक इन प्रदूषणों से निपटने में सहायता मिल सकती है.  
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