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14 July 2014

बलात्कार के मूल में है मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन




दिनों-दिन बढ़ती बलात्कार की घटनाएँ समाज में आ रहे मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन का दुष्परिणाम हैं। रिश्तों को हाशिये पर लगाकर यौन-कुंठित व्यक्तियों द्वारा अपनी ही बेटी, बहिन, भतीजी एवं अन्य निकटवर्ती रिश्तों से शारीरिक दुष्कर्म किया जा रहा है। यौन-कुंठा का इतना वीभत्स रूप शायद की कभी देखने को मिला हो। आज स्त्री, बच्चियाँ, वृद्धा कहीं भी सुरक्षित नहीं दिखती हैं। देश की राजधानी हो या प्रदेशों की राजधानी, महानगर हो या छोटा क़स्बा, उच्च शिक्षित महिला हो या फिर गरीब महिला, सामान्य स्वस्थ स्त्री हो या मानसिक विक्षिप्त, बालिका हो या वृद्धा महिला सुरक्षित नहीं दिखती है।
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दिल्ली हादसे के बाद बलात्कारियों को फाँसी देने की मांग उठी। क़ानून का पुनर्मूल्यांकन कर दोषियों के लिए सख्त से सख्त सजा का प्रावधान किया गया। इसके बाद भी बलात्कार न तो रुके न ही कम हुए बल्कि उनमें वीभत्सता दिखने लगी। यहाँ समस्या के समाधान की आवश्यकता है न कि आपसी आरोप-प्रत्यारोप करने की। ये जानना आवश्यक है कि क्या पुरुष प्रधान सोच ही बलात्कार के लिए उत्तरदायी है? क्या पितृसत्तात्मक परिवार की अवधारणा के कारण ही समाज में बलात्कार की घटनाएँ हो रही हैं? ये समाज का दुर्भाग्य है कि स्त्री पुरुष के संबंधों को दो अलग-अलग रूपों में परिभाषित किया जाने लगा है जहाँ पुरुष को भोगवादी व्यवस्था का पक्षधर तथा स्त्री को उपभोग सम्बन्धी वस्तु सिद्ध किया जा रहा है। स्त्री पुरुष के अपने-अपने समाज बनाने के कारण भी हिंसात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिला है। अपराधी इसी अलगाववादी मानसिकता का लाभ उठाकर निर्द्वन्द्व भाव से अपराध पर अपराध किये जाता है।
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आज जरूरत स्त्री पुरुष के आपसी विभेद की नहीं वरन इस जघन्य अपराध को नियंत्रित करने की है। उपभोक्तावादी संस्कृति के चलन ने भारतीय बाज़ारों को विज्ञापनों और उत्पादों की चकाचौंध से दिग्भ्रमित सा कर दिया है। किसी भी उत्पाद का विज्ञापन हो, पुरुषों के उपभोग की वस्तु हो, बच्चों की आवश्यकता सम्बन्धी हो या फिर महिलाओं की जरूरत, नारीदेह दर्शन बिना किसी भी तरह का विज्ञापन पूरा नहीं होता है। इसके साथ-साथ इन विज्ञापनों के प्रस्तुतीकरण का प्रभाव भी मन-मष्तिष्क पर अहम् रूप से पड़ रहा है। अधोवस्त्रों के विज्ञापन हों, सौन्दर्य प्रसाधनों के विज्ञापन हों, गर्भनिरोधकों के विज्ञापन हों, पेयपदार्थों के विज्ञापन हों, बॉडी स्प्रे को बेचना हो उनका प्रस्तुतीकरण अश्लीलता से भरपूर दिखाता है। केबिल संस्कृति के चलते आज अश्लीलता घर-घर में परोसी जा रही है वहीं मोबाइल के चलते हर हाथ में अश्लीलता सुशोभित हुई है। मोबाइल पर इंटरनेट की सुलभता के चलते अब हर हाथ अपने साथ यौन संबंधों की सहज-सरल प्रस्तुति, नारीदेह के कामुक चित्रण, पोर्न साइट्स की अश्लीलता लिए घूमता है। इससे कामुक प्रवृत्ति के व्यक्ति को नारीदेह अत्यंत सुलभ और सहज लगने लगती है, उसे जीवन की एकमात्र आवश्यकता सेक्स लगने लगती है। नारीदेह के बिना, सेक्स के बगैर उसे अपना जीवन अधूरा सा लगने लगता है ऐसी स्थिति में वह अपनी यौनेच्छा को शांत करने का जरिया खोजने लगता है। किसी भी रूप में शारीरिकता की लालसा, यौनेच्छा संतुष्टि की कामना बलात्कार जैसे अपराध को जन्म देती है। बलात्कार के मूल में स्त्री के प्रति विद्वेष, व्यक्तिगत रंजिश का होना अपवादस्वरूप कहीं-कहीं हो सकता है अन्यथा की स्थिति में इसके मूल में यौन-कुंठा ही है। महिलाओं के साथ शारीरिक संबंधों की पूर्ति में कठिनाई अथवा बाधा उत्पन्न होने पर बलात्कार का विकृत रूप गैंग-रेप में अथवा मासूम बच्चियों अथवा परिवार की बच्चियों के शोषण के रूप में सामने आ रहा है। दरअसल अभिभावकों द्वारा पर्याप्त यौन शिक्षा तथा आपसी वार्तालाप का अभाव भी बच्चियों में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहा है। ऐसी स्थिति में किसी भी परिचित अथवा अपरिचित व्यक्ति द्वारा छेड़छाड़ अथवा यौन हिंसा को ये बच्चियाँ छिपा जाती हैं, यही ख़ामोशी अपराधी के हौसले को बढ़ाती है और वह अपने कुकृत्यों को अंजाम देता रहता है।
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बलात्कार रोकने अथवा कम करने का उपाय कानूनी दृष्टि से ज्यादा सामाजिक और सांस्कृतिक है। नारीदेह की कामुक छवियों के सामने आने पर रोक लगे। देश भर में पोर्न साइट्स पर पूर्णरूप से प्रतिबन्ध लगाया जाए। यौन शिक्षा को पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल करने के साथ-साथ बच्चियों को शारीरिक सुरक्षा सम्बन्धी प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से विद्यालयों में दिया जाना चाहिए। वेश्यावृत्ति को कानूनी मान्यता देकर यौन-कुंठित व्यक्तियों की यौनेच्छा शमन की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि लड़कियों के पहनने-ओढ़ने को लेकर बंदिशें लगाई जाएँ तो लड़कों को भी महिलाओं की इज्जत करनी सिखाई जानी चाहिए। बलात्कार के मूल में यदि नारीदेह की कामुक छवि का प्रदर्शन है तो संस्कृति से विमुख होना भी एक अन्य कारण हो सकता है। भारतीय संस्कृति के गौरवमयी आँचल की छाँव को त्यागकर मांसलता, अश्लीलता की चकाचौंध भरी धूप को स्वीकारने से रिश्तों की गर्माहट, भावनाओं की पवित्रता को सुखाने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त होने वाला नहीं और इसका खामियाजा हमारी बेटियों को उठाना पड़ रहा है।
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