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11 July 2014

मोदी का पहला बजट : जन-भावनाएँ और देश-हित




जैसा कि तय था, आम बजट पर सत्ता पक्ष की तरफ से सकारात्मक और विपक्ष की तरफ से नकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. विपक्ष जो विगत दस वर्षों से इसी तरह की आँकड़ेबाज़ी करने में लगा था, तो उसको इस बजट से आपत्ति क्यों है, ये समझ से परे है? यदि वर्तमान सरकार भी उसी की नीतियों को आगे बढ़ा रही है, तो उनका रोना किस कारण से? क्या महज इसलिए कि इस बजट में गाँधी नाम से, नेहरू नाम से किसी योजना का सूत्रपात नहीं किया गया. बजाय गाँधी-नेहरू की मूर्तियों की स्थापना के सरदार पटेल की मूर्ति बनाये जाने की बात कही गई. बहरहाल, ये चर्चा का विषय नहीं है, चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि क्या वाकई इस बजट से देश की आर्थिक दशा सुधरेगी? क्या वाकई ये विकास की राह पर ले जाने वाला बजट है?
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जिस तरह का बहुमत पाकर भाजपा सत्तासीन हुई है, उससे न केवल आम आदमी में बल्कि खुद विपक्ष के बहुसंख्यक लोगों में इस बात की उम्मीद जागी थी कि इस बार का बजट कुछ अलग हटकर होगा. जिस तरह से मोदी ने अपने आरंभिक भाषण में कड़वी दवा देने की बात कही थी, उससे लगा था कि कुछ न कुछ कठोर कदम अवश्य उठाये जायेंगे किन्तु ऐसा नहीं हुआ. विस्तार में यहाँ बजट की चर्चा करना संभव नहीं है किन्तु बजट की सकारात्मकता को इस बात से समझा जा सकता है कि महज राजनैतिक स्टंटबाज़ी न करते हुए महिलाओं की सुरक्षा हेतु, बेटियों के भविष्य हेतु, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, कृषि हेतु अलग से व्यवस्थाएं की गई हैं, प्रावधान किये गए हैं. रसोई गैस सिलेण्डर की संख्या की कटौती न करके गृहणियों को राहत दी है तो आयकर सीमा में बहुत थोड़ी सी वृद्धि करके और छूटयोग्य निवेश सीमा में भी अल्प वृद्धि करके आम आदमियों को देश से विकास से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है. मनरेगा को कृषि से सम्बद्ध करने के प्रयास से इसे बजाय समाप्त करने के और बेहतर बनाये जाने पर बल दिया है. और भी ऐसे प्रावधान हैं जो एक उम्मीद जगाते हैं, विकास की आस बंधाते हैं.
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बजट पेश हो जाने के बाद सवाल खड़ा होता है कि इन योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे होगा, कौन करेगा, कितना करेगा. योजनाओं का बना देना काफी नहीं होता, अब जरूरी है उसके क्रियान्वयन हेतु समुचित कदम उठाये जाने की, आर्थिक आधार जुटाए जाने की. जिस एफडीआई का विरोध लगातार होता रहा, उसी को लागू करने की बात सामने आई. यहाँ इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है. निवेश आवश्यक हो किन्तु अनिवार्य नहीं, ऐसी मानसिकता के साथ यदि निवेश होगा तो अवश्य ही देश-हित में होगा. सब्सिडी के सहारे देश की अर्थव्यवस्था नहीं चलाई जा सकती, ये एक अल्पकालिक व्यवस्था है और यदि आर्थिक मोर्चे पर दीर्घकालिक सफलता चाहिए है तो सब्सिडी से बचने की आदत डालनी ही होगी, जनता को भी, सरकार को भी. नई सरकार से उम्मीद लगाये बैठे लोगों को समझना होगा कि करों के भरोसे ही कोई भी सरकार देश के लिए धन का वन्दोबस्त करती है. ऐसे में व्यक्ति अपनी आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ देश को कर देने में कोताही बरतेगा तो आर्थिक मोर्चे पर कहीं न कहीं उसी को चपत लगनी तय है. सरकार को भी ऐसा नहीं कि समस्त करों का बोझ आम आदमी पर, नौकरीपेशा पर, छोटे उद्योगकर्मियों पर ही डाल दे, उसे इस तरह के प्रावधान करने होंगे जिससे बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों से अधिक से अधिक कर वसूला जाये. उनको दी जाने वाली सब्सिडी को बंद करके देश को आर्थिक समृद्ध बनाया जाये.
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सरकार अपना काम करने में लगी है, अब आम आदमी को, सामान्य नागरिक को भी देश-हित में कदम उठाये जाने की जरूरत है. सब्सिडी, छूट किसी भी रूप में हमारी विलासिता पूर्ति के लिए नहीं किये जाते; कोई भी प्रावधान बिना हमारी मदद के पूरे नहीं हो सकते; कोई भी योजना बिना हमारे सहयोग के संचालित नहीं हो सकती, ऐसे में हम सभी नागरिकों का प्रयास ये हो कि समवेत रूप में अपने-अपने क्षेत्र में संचालित सरकारी योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित कराएँ, सहयोग दें. इससे अपने क्षेत्र का विकास तो होगा ही, देश भी विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेगा.
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चित्र गूगल छवियों से साभार

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