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28 May 2014

मंत्री भाजपाई है तो विरोध बनता है, और इनका विरोध भी कर लो




पहले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का विरोध अब स्मृति ईरानी के मानव संसाधन मंत्रालय दिए जाने को लेकर विरोध. उनकी शैक्षिक योग्यता पर सवालिया निशान लगाते हुए उनकी शैक्षिक योग्यता को नाकाफी बताया जाने लगा. हमारे संविधान में जनप्रतिनिधियों हेतु न्यूनतम शैक्षिक योग्यता का कोई प्रतिबन्ध नहीं है दूसरी ओर मुख्यमंत्री, गृह मंत्री जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर निम्न शैक्षिक योग्यता वाले लोग विराजमान हो चुके हैं, इनमें ज्ञानी जैल सिंह, बूटा सिंह, राबड़ी देवी का नाम लिया जा सकता है. ऐसे में स्मृति का विरोध महज विरोध करने के लिए ही किया जा रहा है न कि तर्कसंगत रूप में.
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स्मृति ईरानी सम्बन्धी विरोध के पूर्व कुछ तथ्यों को जान लेना उनके लिए आवश्यक है जो विरोध की राजनीति करने में लगे हैं. उत्तर प्रदेश विधान परिषद् में स्नातक तथा शिक्षक विधायक के लिए कोई भी भारतीय नागरिक उम्मीदवार हो सकता है किन्तु स्नातक विधायक निर्वाचन हेतु स्नातक या उससे उच्च शिक्षा प्राप्त मतदाता तथा शिक्षक विधायक निर्वाचन हेतु शिक्षक मतदाता ही मतदान कर सकते हैं. क्या इस तरह के संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन आवश्यक नहीं कि स्नातक और शिक्षक विधायक के प्रतिनिधि उन्हीं के वर्ग से हो?
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इस देश में योग्यता को दरकिनार नहीं किया जाता है. कई-कई प्रतिभावान खिलाड़ी ऐसे हुए हैं जिनकी योग्यता के कारण उनको विभिन्न विभागों में उच्च पदों पर नियुक्ति मिली. हाल में ही कई क्रिकेट खिलाडियों को सेना में पदवी दी गई (भले ही ये मानद रूप में रही हो) किन्तु इसके लिए उनकी शैक्षिक योग्यता को पैमाना नहीं बनाया गया. इसी देश में कबीरदास, सूरदास, मीराबाई आदि पर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग अध्ययन कर रहे हैं, इनकी रचनाओं पर टीका, मीमांसा, व्याख्या दे रहे हैं, शोधकार्य संपन्न किये जा रहे हैं जबकि ये सर्वविदित है कि ये और इन जैसे अनेक रचनाकार अशिक्षित थे.
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एक तरफ स्मृति ईरानी के मंत्री पद का विरोध इसलिए हो रहा है कि उनके पास पर्याप्त शिक्षा नहीं है वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त तथा न्यूनतम अर्हता प्राप्त युवाओं को जो अशासकीय महाविद्यालयों में मानदेय तथा स्व-वित्तपोषित योजना के अंतर्गत अध्यापन कार्य कर रहे हैं, हटाने सम्बन्धी प्रक्रिया शुरू किया जाने की सुगबुगाहट है. और इनके स्थान पर तकनीकी रूप से सेवानिवृत्त महाविद्यालयीन शिक्षकों (७० वर्ष तक की उम्र वाले) को मानदेय शिक्षक के रूप में नियुक्त किये जाने की प्रक्रिया पूर्ण कर ली गई है. सरकार के इस निर्णय का समाज के किसी भी कोने से विरोध नहीं किया गया. क्या ये विद्रूपता नहीं कि युवा शिक्षकों को निकालकर रिटायर शिक्षकों को अध्यापन हेतु नियुक्त किया जायेगा, जो पहले से ही पेंशन के रूप में चालीस-पचास हजार रुपये प्रतिमाह प्राप्त कर रहे हैं?
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स्मृति के खिलाफ उठे इस विरोध को समझने की आवश्यता है; इसके पीछे की मानसिकता को समझने की जरूरत है. कहीं ये विरोध भाजपा के सत्तासीन होने की खिसियाहट तो नहीं? कहीं इस विरोध का कारण मंत्री पद पर ऐसी महिला का नियुक्त होना तो नहीं जिसने अपना रास्ता खुद बनाया? इस विरोध के पीछे कहीं स्मृति का मात्र ३८ वर्ष की आयु का महिला होना तो नहीं? आज भी समाज का बहुत बड़ा वर्ग भाजपा को सत्तासीन होते नहीं देखना चाह रहा था ठीक उसी तरह बहुत बड़ा वर्ग आज भी महिलाओं को उन्नति करते नहीं देख पा रहा है, तेजतर्रार महिलाओं को आगे बढ़ता पसंद नहीं कर रहा है. मानव संसाधन मंत्री के रूप में कुछ समय का काम देखने के पश्चात् स्मृति का आकलन किया जाता तो ज्यादा सही रहता; उसके कार्यों के परिणामों के पश्चात् उसकी शैक्षिक योग्यता का विश्लेषण किया जाना उपयुक्त रहता किन्तु अंध-विरोध करने वालों को इन सबसे क्या वास्ता. अंत में एक निर्णायक तथ्य या भी कि स्मृति ईरानी की शैक्षिक योग्यता पर उठे विवाद को सार्थक दृष्टि से देखने की जरूरत है, यदि उनकी शैक्षिक योग्यता मंत्री पद के अथवा मानव संसाधन मंत्री हेतु उपयुक्त नहीं है तो अब राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों आदि सहित अन्य संवैधानिक पदों हेतु शैक्षिक योग्यता का, अधिकतम आयु का निर्धारण किया जाना चाहिए. राजनैतिक सुधार हेतु एक कदम इस ओर भी उठाया जाना चाहिए.
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