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06 November 2013

पहले देश सुधारो फिर अंतरिक्ष जाओ




मंगलयान पृथ्वी की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित कर लिया गया. भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों में इस अभियान की सफलता मील का पत्थर साबित होगी क्योंकि अभी तक सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोपियन यूनियन ही मंगल अभियान में सफल रही है. भारत का पड़ोसी देश चीन, जो हर मामले में सम्पूर्व विश्व में अपनी धाक ज़माने में सफल रहा है वो भी मंगल अभियान में असफल रहा है. भारत का इस तरह से अंतरिक्ष में छलांग लगा देना देश के गौरव को बढ़ाएगा साथ ही वैश्विक रूप में उसकी साख को भी मजबूत करेगा. निश्चित रूप से देश के वैज्ञानिकों के लिए, देश में रहकर ही देश की उन्नति के लिए कार्य करती पीढ़ी के लिए भी ये क्षण गौरवान्वित करने वाला है मगर अभी इस मंगलयान की अंतिम सफलता उसके मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित होने के बाद ही निर्धारित होगी. दस महीने की लम्बी यात्रा के बाद मंगलयान २४ सितम्बर २०१४ को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा. उस समय की सफलता देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की अंतिम सफलता के रूप में परिभाषित होगी.
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ये गौरव का, हर्ष का, उत्साह का विषय है किन्तु इसके साथ ही देश को यहाँ की मूलभूत आवश्यकताओं की जद्दोजहद में फंसे लोगों की मायूसी को, उनके निरुत्साह को, उनकी निराशा को, उनकी हताशा को नहीं भूलना चाहिए. आज भी देश की बहुत बड़ी जनसंख्या रोटी, कपड़ा, मकान, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत है. एक तरफ हमारे वैज्ञानिक मंगल पर जीवन की खोज करने निकल चुके हैं और दूसरी तरह हम कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, महिला हिंसा के द्वारा जीवन नष्ट करने में लगे हैं. अंतरिक्ष पर पानी की तलाश की जा रही है और यहाँ हम धरती से नदी, नाहर, तालाब आदि को समाप्त करते जा रहे हैं. अरबों रुपये खर्च करके सुदूर अंतरिक्ष में रहने के ठिकाने खोजे जा रहे हैं जबकि हम एक-दो चिंगारियां सुलगाकर यहाँ बस्तियों की बस्तियां उजाड़ने का कृत्य कर रहे हैं. पृथ्वी से जानवरों को भेजकर उन पर अंतरिक्ष वातावरण का प्रभाव जानने के प्रयोग किये जा रहे हैं जबकि यहाँ धरती के इंसानों को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित करके उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं. इस तरह का दोहरा रवैया अपनाकर हम खुद को विज्ञान युग का मानव सिद्ध कर रहे हैं; खुद को आधुनिक और वैश्विक शक्ति बनाने का काम कर रहे हैं.
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आज भी हमारे देश में लाखों लोग आँखों की रौशनी के लिए तरस रहे हैं; तमाम लोग शारीरिक विकलांगता के कारण नारकीय जीवन बिता रहे हैं; अंग प्रत्यारोपण के मामले में आपराधिक रैकेट बुरी तरह से काम कर रहा है; कैंसर, एड्स जैसी और भी बीमारियाँ स्वस्थ समाज की संकल्पना में बाधा पैदा कर रही हैं. ऐसे में अरबों-खरबों रुपये लगाकर, दस महीने की यात्रा के बाद अंतरिक्ष को नापने की, उस पर खोज करने की, जीवन ढूँढने की कवायद एक तरह का शेखचिल्लीपन ही कहा जायेगा. समय के साथ वैश्विक शक्ति स्थापित करने के लिए ये सब आवश्यक है; खुद को वैज्ञानिक शक्ति सिद्ध करने के लिए भी ये आवश्यक है; आधुनिक युग में अपनी वैश्विक साख बनाये रखने के लिए भी ये आवश्यक है किन्तु याद रखना चाहिए कि किसी भी देश की साख उसकी नीतियों, विदेश नीति, आंतरिक संसाधनों, आर्थिक सुदृढ़ता, शिक्षित नागरिकों, स्वस्थ समाज, स्वतंत्र विचारधारा आदि से भी निर्धारित होती है. अंतरिक्ष में लम्बी छलांग लगाने से उत्पन्न वैश्विक साख को आतंकवाद, नक्सलवाद, महिला-हिंसा, पड़ोसी देशों से संचालित आतंकवाद, बेरोजगारी, तुष्टिकरण आदि प्रभावित करते हैं और देश की टांग खींचकर उसे वापस धरालत पर पटक देते हैं. प्रयास ये हो कि एक तरफ अंतरिक्ष में जाने की तैयारी होती रहे दूसरी तरफ देश की धरती पर रह रहे नागरिकों को भी समृद्ध, संपन्न, स्वस्थ, शिक्षित करने के कार्यक्रम सकारात्मक रूप से चलते रहें.

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