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13 July 2013

मुस्लिम खुद को वोट-बैंक नहीं, नागरिक समझें




“हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, आपस में सब भाई-भाई” का नारा अपने आपमें आदर्शवाद की अद्भुत संकल्पना पेश करता है. इसके बाद भी आये दिन धार्मिक उन्माद, धार्मिक विभेद से समूचे देश का सामना होता रहता है. ये सुनने में भले ही अजीब लगे और शायद देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादियों को बहुत ही बुरा लगे पर सत्य ये है कि आपस में भाई-भाई की संकल्पना नितांत भ्रामक है. इस देश में हिन्दू-हिन्दू, मुस्लिम-मुस्लिम, सिख-सिख, ईसाई-ईसाई आपस में ही भाई-भाई की तरह से निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं, तब इन सबका भाई-भाई की तरह निर्वाह करना कहाँ से संभव हो सकता है? देश में जिस तरह से जातिगत विभेद से अलगाव की स्थिति देखने को मिलती है उसी तरह से धर्म के नाम पर भी कटुता देखने को मिलती है और आये दिन इसे देश के राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों, धर्मनिरपेक्ष के समर्थकों, धार्मिक संगठनों द्वारा हवा दी जाती रहती है.
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धार्मिक विभेद के रूप में हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर आये दिन ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जाती रहती है. वोट-बैंक की चाह रखने वाले राजनीतिज्ञों की तरफ से मुसलमानों को अल्पसंख्यक के नाम पर हर बार यही समझाया जाता है कि वे देश की मुख्य-धारा से अलग किये जा रहे हैं. राजनीतिज्ञों की इस मानसिकता को मीडिया द्वारा, बुद्धिजीवियों द्वारा, लेखकों द्वारा भी प्रोत्साहन दिया जाता रहता है. अधिसंख्यक रूप में मुस्लिम संगठनों द्वारा, मुस्लिम नेताओं द्वारा, मुस्लिम धर्म-गुरुओं, मौलानाओं द्वारा, मुस्लिम बुद्धिजीवियों द्वारा इस बात का प्रचार-प्रसार किया जाता रहता है कि मुस्लिम इस देश में सुरक्षित नहीं है, उसके हक़ को लूटा जा रहा है, उसके साथ अन्याय किया जा रहा है, उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है. यहाँ इन्हीं लोगों को इस तथ्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए कि इस देश के शीर्ष पदों पर मुस्लिम लोग पहुंचे हैं, राजनीति से लेकर सरकारी नौकरियों में इस धर्म के लोग बहुतायत में आसीन रहे हैं, आज भी आसीन हैं.
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मुस्लिमों को यदि आपत्ति होनी चाहिए तो उनके नाम पर राजनीति करते नेताओं से, उनके नाम पर समाज में तनावपूर्ण माहौल बनाने वाली मीडिया से किन्तु वे इससे इतर सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं को अपनी हालत का जिम्मेवार ठहराते हैं. एक पुलिस अधिकारी की हत्या पर पूरे देश भर में आन्दोलन सा छेड़ने वाले मुस्लिमों ने कभी किसी दूसरे धर्म के अधिकारी की हत्या पर ऐसा ही रोष व्यक्त किया है? किसी आतंकी की मौत हो जाने पर भी लामबंद होने वाले मुस्लिम मजहबी संगठन क्या शहीदों के स्मारक को तोड़े जाने वाली मुस्लिम भीड़ के प्रति लामबंद होते हैं? कहीं किसी कोने में हिन्दू नाम आने मात्र से ही समाज में सांप्रदायिक माहौल बनने लगता है किन्तु जब कोई मुस्लिम राजनीतिज्ञ खुले मंच से धार्मिक उन्माद पैदा कर रहा होता है तो ये लोग चुप्पी क्यों साधे रहते हैं? सरकारों की तरफ से अल्पसंख्यक के नाम पर तमाम सारी सुविधाएँ मिलने के बाद भी ये अपने आपको वोट-बैंक बनाये जाने का विरोध क्यों नहीं करते हैं? ‘दंगा कोई भी हो, घाव देकर ही जाता है’ इसके आलोक में मुस्लिम समुदाय के लोगों को ये बात भी समझनी चाहिए कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ उनको एक दंगे के नाम पर आज तक बरगलाते आये हैं, उनके दुःख को दिखाते आये हैं, तो उन दंगों के दुखों का क्या जो कहीं न कहीं उनके समुदाय के लोगों के शामिल होने के कारण उत्पन्न हुए हैं?
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इस देश के मुसलमानों को ये बात खुद समझनी होगी कि ये देश उनका भी है पर वे इस देश के वोट-बैंक नहीं हैं. उनको ये समझना होगा कि देश की मुख्य-धारा में शामिल होने से उन्हें हिन्दू नहीं वरन खुद उनकी सोच ही रोक रही है. एक गुजरात दंगे का नाम ले-लेकर उनकी भावनाओं से खेलने वाले, उनके दुःख को कुरेदने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों से उन्हें बचने की जरूरत है. जब तक मुस्लिम समुदाय अपनी स्वतंत्र सोच को न रखते हुए अपने आपको राजनीतिज्ञों के इशारे पर चलता रहेगा, तब तक इस तरह के विभ्रम बने ही रहेंगे. जब तक मुस्लिम समुदाय अपने आपको वोट-बैंक मानकर इस देश की मुख्य-धारा में शामिल होने का प्रयास करता रहेगा, तब तक वो इन राजनीतिज्ञों के हाथ की कठपुतली ही बना रहेगा. यदि आदर्शवादी नारे की संकल्पना को सत्य करना है तो मुस्लिम समुदाय को कुछ बातों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.

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