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06 June 2013

ढकोसला-अभ्यस्त इन्सान का प्रयास



तमाम आयोजनों में ढकोसलों को करने के अभ्यस्त इन्सान ने पर्यावरण बचाने के लिए भी जबरदस्त रूप से ढकोसला करके दिखा दिया. पूरी शिद्दत से उसके द्वारा वृक्षारोपण किया गया, हरित-गोष्ठियों का आयोजन किया गया, लोगों को बाग़-बगीचों, हरे-भरे पेड़-पौधों के लाभों से परिचित करवाया गया. धरती के बढ़ते तापक्रम की गंभीर चर्चा की गई और अपनी माँ समान धरती को बचाने की गुहार भी इंसानों द्वारा इंसानों से लगाई गई. नदियों के सूखने, पावन जल के घनघोर रूप से प्रदूषित होने का रोना भी रोया गया. अत्यधिक जागरूक लोगों ने शपथ ली कि किसी भी कीमत पर अब पर्यावरण को नुकसान नहीं होने दिया जायेगा, अब पेड़-पौधों को भी अपनी संतान समझ पाला-पोसा जायेगा, नदियों की पवित्रता को अक्षुण्य रखते हुए उनके जल को जीवनदायिनी बनाया जायेगा. 
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कितना सुखद लगता है कि स्वार्थ में लिप्त इन्सान सक्रियता से पर्यावरण को बचाने में लगा है. वह अपने अति-व्यस्त समय में से कुछ समय निकाल कर पेड़-पौधों-नदियों-जल को बचाने की बात कर रहा है. आज के समय में जबकि अपने सगे-सम्बन्धियों की संतानों को अपना नहीं समझा जाता, वो पेड़-पौधों को संतान मानकर पालने-पोसने की पहल कर रहा है. इन सुखद पलों के एहसास के साथ कुछ अति-दुखद पहलू भी दिखते हैं, जिन्हें इन्सान देखने की कोशिश भी नहीं करता या फिर देखकर भी अनदेखा कर देता है. एक तरफ पेड़ों को बचाने की मुहिम, दूसरी तरफ कंक्रीट के जंगल खड़े करने के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई; एक तरफ वृक्षारोपण के द्वारा अधिक से अधिक भूमि को हराभरा बनाये जाने की कोशिश, दूसरी तरफ धनलिप्सा में जंगल के जंगलों को उजाड़ देना; ग्लोबल वार्मिंग का नाम लेकर धरती को बचाने की इच्छा दिखाई जाएगी, जबकि कारों, घरों, कार्यालयों में अनवरत एसी का प्रयोग किया जायेगा, एक तरफ नदियों को, नदी-जल को सुरक्षित-संरक्षित रखने की योजनाओं को अमल में लाने के तरीके समझाए जायेंगे, दूसरी तरफ घरों, कारखानों आदि के प्रदूषक नदियों में फेंके जायेंगे. समझने की बात है कि अति भोगवादी जीवनशैली के चलते कैसे प्राकृतिक जीवन का सुख भोग जा सकता है? 
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एक कटु-सत्य किसी से नहीं छिपा है कि आज धरती की, पर्यावरण की ऐसी हालत करने वाला प्रमुख कारक इन्सान ही है. ऐसे में जब तक खुद इन्सान के द्वारा ही सार्थक कदम नहीं उठाये जायेंगे, तब तक न तो प्रदूषण से मुक्ति मिलनी है, न ही धरती को ग्लोबल वार्मिंग से छुटकारा मिलना है, न ही इन्सान को प्राकृतिक सुकून प्राप्त होना है. सिर्फ दिखावा करने के नाम पर, चंद लोगों के सामने ढकोसला करने की चाह में, इक्का-दुक्का पेड़ लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने की मानसिकता से पर्यावरण का किसी भी प्रकार से भला होने वाला नहीं है. आज सोच को सकारात्मक बनाकर उसे व्यवहार में, अमल में लाने की अनिवार्यता है (अब आवश्यकता भी पीछे रह गई है)

1 comment:

jai shankar tiwari said...

sarvatha sach. behatreen vichar.