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07 April 2013

आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक है सांस्कृतिक आतंकवाद


          जब भी आतंकवाद की चर्चा की जाती है तो मन में तुरन्त ही बम विस्फोट, अपहरण, आगजनी, रेल दुर्घटनायें, मौत जैसी वीभत्स घटनाओं की छवि अंकित हो जाती है। देश तथा देशवासी विगत कई वर्षों से आतंक के इसी चेहरे से परिचित रहे हैं। आतंकवाद का यह रूप हमारे मन-मष्तिष्क पर इस कदर से हावी हो गया है कि हमें इसका कोई अन्य स्वरूप नजर ही नहीं आता है। देखा जाये तो यह आतंकवाद का वह चेहरा है जो हमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है, इसके अतिरिक्त अन्य आतंक के चेहरे हमारे आसपास होने के बाद भी हमें दिखाई नहीं देते हैं। विभिन्न प्रकार के आतंकी स्वरूपों में हमें प्रमुखता से सांस्कृतिक आतंकवाद को देखने और समझने की आवश्यकता है।
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          सांस्कृतिक आतंकवाद देश के अन्दर आतंक की वह अवधारणा है जो बिना जान लिये, बिना बम धमाके किये हमारे देश को खोखला कर रही है। देश के समृद्ध विकास, आर्थिक उन्नति, प्रोद्योगिकी सक्षमता, शैक्षिक उन्नयन, उसकी सांस्कृतिक विरासत, जीवन-मूल्यों, मानवतावाद आदि से अपना विभेद रखने वाले देशों ने जब देख लिया कि भारत को आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से, सैन्य क्षमता के द्वारा, विज्ञान-प्रोद्योगिकी के द्वारा नियन्त्रण में रखना सम्भव नहीं है तो देश-विरोधी ताकतों ने विध्वंस का सहारा लिया। देश भर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं, मजहबी फसादों के बाद भी देश की एकता अक्षुण्य रही, विकास-यात्रा बाधित नहीं हुई तो देश में सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने का कार्य विघटनकारी ताकतों के द्वारा किया जाने लगा।
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          युवाओं को आकर्षित कर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले समारोहों का आयोजन किया जाने लगा; विभिन्न विदेशी चैनलों के जरिये से घरों के भीतर पहुंच कर हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जाने लगा; आधुनिकता के नाम पर परिवार को विखण्डित किया जाने लगा; समूची दुनिया में भातरीय अस्मिता के नाम पर यहां की महिलाओं को आधार बनाकर विभिन्न विद्रूप कार्यक्रमों को संचालन किया जाने लगा। प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो भारत देश सिर्फ और सिर्फ देह के आसपास विचरने वाले, महिलाओं के प्रति हिंसा का भाव रखने वाले, सेक्स के प्रति लालायित रहने वाले नागरिकों का देश बन गया हो। आधुनिकता की अवधारणा को विभिन्न तरीकों से इस तरह से परिभाषित किया जाने लगा कि देश की सांस्कृतिक विरासत यहां के युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों को भी दकियानूसी, पाखंड से भरी दिखाई देनी लगी है। इन सबका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे समाज से परिवार की अवधारणा का विलोपन हो गया; रिश्तों की मर्यादा का ह्रास होने लगा; महिलाओं को आधार बनाकर बाजारवाद की संकल्पना का विकास होने लगा; राष्ट्रवाद की गरिमामयी छवि का विखण्डन होने लगा। 
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          आज के बम धमाकों, नित होते हादसों, मौतों के बीच इस आतंकवाद से भी लड़ने की आवश्यकता है। हमें हमारी युवा पीढ़ी के सामने देश के स्वर्णिम इतिहास को रखना होगा; यहां की भव्य सांस्कृति विरासत से उसका परिचय करवाना होगा; देह-सुख से इतर रिश्तों की मर्यादा को समझाना होगा; बाजारवाद से इतर सामाजिकता का विकास करवाना होगा; वैश्विक जीवन के साथ-साथ राष्ट्रवाद का पाठ भी पढ़ाना होगा; आर्थिक मूल्यों से ऊपर जीवन-मूल्यों को रखना होगा। यदि हम इस तरह के कुछ कदमों को उठाकर दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी को समझाने में सफल हुए तो सम्भव है कि आतंकवाद के इस छिपे चेहरे-सांस्कृतिक आतंकवाद-को हम अपने घरों के भीतर पहुंचने से रोक लेंगे।
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