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08 August 2012

बुन्देलखण्डवासियों के लिए गौरव की अनुभूति

बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण के प्रति और बुन्देली भाषा के प्रति अनुराग रखने वालों के लिए खुशी की खबर आई है। सरकारी सूत्रों के अनुसार ऐसे संकेत प्राप्त हुए हैं कि आज दिनांक-8 अगस्त 2012 से शुरू होने वाले मानसून सत्र में बुन्देली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जायेगा। ये समाचार अपने आपमें सुखद अनुभूति करवाने वाला है।

उत्तर प्रदेश के और मध्य प्रदेश के वे हिस्से जो बुन्देलखण्ड के रूप में जाने-पहचाने जाते हैं और जनमानस में स्वीकार्य हैं, उनके निवासियों द्वारा विगत कई दशकों से पृथक बुन्देलखण्ड राज्य के लिए आन्दोलन चलाया जा रहा है। केन्द्र सरकार से बराबर एक ही मांग की जाती रही है कि दोनों प्रदेशों के हिस्सों को मिला कर पृथक बुन्देलखण्ड राज्य का निर्माण कर दिया जाये। इस मांग को लेकर जहां यहां के निवासियों द्वारा अपना आन्दोलन निस्वार्थ भाव से किया जाता रहा, वहीं दूसरी ओर राजनीति करने वालों ने इस मुद्दे पर भी अपनी स्वार्थपरक राजनीति करने का मौका नहीं छोड़ा।

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने तो चुनाव के ठीक पूर्व बुन्देलखण्ड के लोगों को वोट-बैंक में परिवर्तित करने की नीयत से पूरे प्रदेश को चार भागों में बांटने की निरर्थक कोशिश करके पृथक बुन्देलखण्ड की मांग को केन्द्र सरकार के पाले में सरका दिया था। जैसा कि सभी को भली-भांति ज्ञात था और उस प्रस्ताव का वैसा ही हश्र भी हुआ, केन्द्र सरकार द्वारा उस बेतुके प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया।

पूर्व में बहुत कुछ हुआ है, बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण के लिए बहुत से लोगों ने निस्वार्थ रूप से काम किया है। अब भले ही बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण की बात न हो रही हो किन्तु यह भी बुन्देलखण्डवासियों के लिए किसी जीत से कम नहीं है कि बुन्देली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा रहा है। आधुनिकता के वशीभूत होकर जो बुन्देलखण्डवासी अपनी ही भाषा को बोलने से शरमाते थे, बचते थे, इसे जाहिल-गंवारों की भाषा कह कर पुकारते थे, वे अब स्वयं अपनी सोच पर शर्मिन्दा होने का कार्य करें। यदि सरकार बुन्देली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करती है तो निश्चय ही बुन्देलखण्ड के साहित्यकारों को, यहां के बुन्देली बोलने वालों को गौरव की अनुभूति होगी और आगे भी इस भाषा के विकास हेतु प्रोत्साहन प्राप्त होगा।



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