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15 August 2012

अंधकार मिटाने को अपने सूरज आप बनें हम -- ब्लॉग की 650वीं पोस्ट




आज दिनभर स्वतन्त्रता दिवस पर बधाइयों के लेन-देन का उपक्रम चलता रहा। इसके साथ ही तमाम लोग खुशी जैसे माहौल के बीच भी देश की व्यवस्था को, अपनी आजादी को, देश पर शासन करने वालों को कोसते भी दिखे। बात-बात में वही एक ही पुट कि इस देश का कुछ हो नहीं सकता है। समझ में नहीं आता कि लोग देश का क्या होना देखना चाहते हैं?
देश में विगत कुछ दशकों से जिस तरह से भ्रष्टाचार, अत्याचार, हिंसा, वैमनष्य का वातावरण पनपा है उससे किसी पर विश्वास करना आसान नहीं रह गया है। इसके बाद भी आज स्वतन्त्रता दिवस के इस पावन पर्व की एकदम अन्तिम घड़ी में यही कहना चाह रहे हैं कि भले ही हमारे आसपास कितनी भी अव्यवस्था दिख रही हो किन्तु आशा का सूरज अभी डूबा नहीं है। हमारे देश की विभिन्न क्षेत्रों में होती तरक्की से हम अपना मुंह नहीं मोड़ सकते हैं। हमारी भारतीय मेधा के बल पर ही विदेशी देश अपनी तरक्की की गाथा गाते दिख रहे हैं। और भी बहुत कुछ है जो हमें आशान्वित करता है।
आइये जो अंधकार सा हमें हमारे चारों ओर दिख रहा है उसे दूर करने के लिए किसी सूरज का नहीं, किसी दीपक का इंतजार नहीं करें वरन् अपने सूरज, अपने दीपक आप बनकर देश से अंधकार दूर करने का प्रयास करें।
‘‘स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें’’


"अभी-अभी देखा..ये इस ब्लॉग की 650वीं पोस्ट है...."


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