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19 December 2011

अन्ना आन्दोलन को भटकाव से बचने की आवश्यकता

भारतीय राजनीति इस समय एक विशेष प्रकार के दौर से निकल रही है, जहां नेताओं को अपने आपको सही साबित करने की कोशिश करनी पड़ रही है वहीं दूसरी ओर व्यक्ति विशेष पर सम्पूर्ण गतिविधियां आकर टिक सी गई हैं। वर्तमान में ऐसे कई सारे व्यक्तियों में राहुल गांधी को बहुत ही आसानी से देखा जा सकता है। कोई भी घटनाचक्र हो किसी न किसी रूप में मीडिया के लोगों और कांग्रेस के लोगों के साथ-साथ अन्य दूसरे दल और व्यक्ति भी राहुल के इर्द-गिर्द घूमते से दिखाई पड़ने लगते हैं।

इसको आसानी से इस बात से समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री भी गाहेबगाहे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की चर्चा कर लेते हैं। पार्टी के अघोषित प्रवक्ता के रूप में कार्य कर रहे दिग्विजय सिंह भी आये दिन या कहें कि नियमित रूप से राहुल-पाठ करते दिखाई देते हैं।

यह गलत तब लगता है जब दूसरे दल के लोग अथवा स्वयं को सिविल सोसायटी के रूप में प्रसारित करने वाले भी राहुल गांधी को सही अथवा गलत रूप में प्रसारित-प्रचारित करना शुरू कर देते हैं। यदि देश में क्रान्ति का पर्याय बनकर उभरे अन्ना हजारे राहुल गांधी को निशाना बनाकर कोई बयानबाजी करते हैं तो समझ में नहीं आता है कि इसके पीछे क्या समझा जाये?

सम्पूर्ण परिदृश्य में अन्ना और राहुल को खड़ा करें तो राहुल गांधी की तस्वीर कहीं बहुत छोटी और अपरिपक्व दिखाई देती है। किसी भी क्षेत्र को लें-परिवार इसका अपवाद हो सकता है-तो राहुल गांधी अन्ना हजारे के पासंग भी नहीं ठहरते हैं, इस कारण से अन्ना का राहुल को लेकर बयान देना और इस प्रकार का बयान देना कि उनके इशारे पर ही सदन में स्वीकारने के बाद भी तीन मांगों को ड्राफ्टिंग कमेटी ने नहीं माना।

अन्ना हजारे और उनकी टीम के अलावा देश के लाखों-लाख लोग इस कारण उनके साथ नहीं हैं कि वे किसी दल विशेष को चुनाव में हराने का कार्य करते हैं, किसी नेता विशेष के बयानों पर अपनी तल्ख टिप्पणी देते हैं, संसद को अपने अनशन से झुकाते से दिखते हैं वरन देश का जागरूक वर्ग उनके साथ इसलिए खड़ा हुआ है कि वे एक सार्थक विषय को लेकर चले हैं, उनके द्वारा एक समस्या का निदान खोजे जाने का रास्ता बनता दिखा है। ऐसे में अन्ना का अन्ना होना एक मायने रखता है जिसे वे एक सांसद पर ऐसी टिप्पणी करके जिसके पीछे कोई ठोस आधार नहीं दिखता है, कम सा करते दिखते हैं।

अन्ना हजारे और उनकी टीम को कहीं न कहीं इस बात की आशंका तो थी कि सरकार शीत-सत्र में जनलोकपाल बिल पर अपनी राय स्पष्ट रूप से नहीं रखेगी किन्तु वे कदापि इस बात को मानने को तैयार नहीं रहे होंगे कि ड्राफ्टिंग कमेटी द्वारा उन तीनों मांगों को सिरे से नकार दिया जायेगा जिन्हें सदन ने आपसी सहमति के बाद स्वीकार की थीं। इसी वजह से सदन में बिल आने के बाद हतप्रभ रहे अन्ना के पास आक्रोश में सिर्फ और सिर्फ राहुल ही निशाने पर रहे। अन्ना को और उनकी टीम को आन्दोलन के इस नाजुक मोड़ पर यह ध्यान में रखना होगा कि उनका एक गलत कदम आन्दोलन को भटका सकता क्योंकि उनका किसी एक सांसद पर आरोप लगाने जैसा अतिसंकुचित मन्तव्य नहीं है वरन् उनका उद्देश्य व्यापक है, सम्पूर्ण देश के लिए है, सम्पूर्ण व्यवस्था-सुधार के लिए है।


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1 comment:

Ratan Singh Shekhawat said...

आपके विचारों से सहमत| अन्ना को एक अपरिपक्व सांसद के खिलाफ बयान देकर उसका भाव नहीं बढ़ाना चाहिए

Gyan Darpan
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