31 October 2011

परम्परा के ड्रामे में सरकारी अमले का तमाशा


सरकारी आदेश के बाद भी नवाब बनने की परम्परा को पूरे देश ने देखा। पटौदी में सैफ अली खान को नवाबी सौंपी गई या घोषित की गई, पता नहीं पर एक बात समझ में आई कि सरकारी आदेशों की अवहेलना की गई। किसी परिवार का, उसके शुभचिन्तकों का अपनी परम्परा को पोषित करना, उसका संवर्द्धन करना तो समझ में आता है किन्तु सरकारी अमले का उस परम्परा को देखना, उसका संरक्षण करना समझ से परे है।

यह बात सभी जानते हैं कि देश की आजादी के बाद सरकार ने एक आदेश के द्वारा नवाब जैसी तमाम सारी उपाधियों को समाप्त कर दिया था और इनके उपयोग पर रोक भी लगा दी थी। हालांकि इसके बाद भी तमाम सारे राजघराने अपने नाम के साथ महाराजा, श्रीमंत, राजा, नवाब, युवराज आदि-आदि जैसी उपाधियों को लगाते दिखते रहे हैं। इसके बाद भी आज तमाम सारे चैनलों पर सैफ अली खान की नवाब बनाये जाने की रस्म को देखकर कुछ अटपटा सा लगा।

इस अटपटे दिखने के पीछे परम्परा का निर्वहन नहीं बल्कि उस कार्यक्रम में प्रशासन का लगा होना, मुख्यमंत्री का शामिल होना रहा। इस बात के पीछे कुतर्क सा दिया जा सकता है कि प्रशासन वहां पर भीड़ को नियन्त्रित करने के लिए था, लोगों की सुरक्षा के लिए था किन्तु क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि वहां उसका उपस्थित होना उस सरकारी आदेश की खिल्ली उड़ाना भी था जिसके आधार पर ऐसी उपाधियों पर रोक लगाई जा चुकी है।

कल को यदि देश का कोई सेलिब्रिटी परम्परा के नाम पर बाल विवाह का आयोजन करने लगे या कोई ऐसा कृत्य करने लगे जो कानूनन स्वीकार न हो, जिस पर सरकार की ओर से रोक लगा दी गई हो, तब भी क्या प्रशासनिक अमला वहां सुरक्षा के इंतजाम करता दिखेगा? क्या तब भी वहां मुख्यमंत्री अथवा अन्य प्रशासनिक अधिकारी अपनी सहभागिता करते दिखाई देंगे? क्या परम्परा के नाम पर कानूनी आदेशों की धाज्जियां उड़ाने को इन सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा रोकने का प्रयास नहीं किया जायेगा?

पता नहीं यह कितना सही है और कितना गलत किन्तु किसी भी कृत्य को परम्परा के नाम पर किसी पारिवारिक कार्यक्रम के द्वारा तो पारिवारिक स्वीकार्यता प्रदान हो सकती है किन्तु यदि उसको आसपास के 52 गांव के लोगों द्वारा, प्रदेश के मुखिया द्वारा, प्रशासन द्वारा भी सहज स्वीकार्यता प्रदान की जाये तो कल को ऑनर किलिंग--जिसे हम दांभिक हत्या के नाम से पुकारते हैं--को रोक पाने में, बाल विवाह को रोक पाने में, कन्या भ्रूण हत्या को समाप्त कर पाने में, दहेज प्रथा को मिटा पाने में कहीं न कहीं नाकाम ही रहेंगे या कहें कि स्वयं को असाहय सा महसूस करेंगे। इसका कारण लोगों में कुतर्क करने की बढ़ती क्षमता, गलत बातों को स्थापित करने की सोच, असामाजिकता को प्रभावी बनाने का षडयन्त्र करने की भावना का विकास होता जा रहा है। आखिर जब आतंकवादियों की फांसी की सजा को रुकवाने के लिए विधानसभाओं में कार्यवाही हो सकती है तो कुछ परम्पराओं को भले ही सरकारी आदेशों में रोक हासिल हो पर उसे सरकारी तन्त्र द्वारा ही पूरा करवाया जाना कौन सा अपराध हो सकता है। हो सकता है कि कल को हम किसी और गलत कार्य को सहज स्वीकार्य परम्परा के रूप में निर्वाह होते देखें, जहां सरकारी अमला पूरे जोशोखरोश से तालियां पीट रहा होगा।


3 comments:

Patali-The-Village said...

प्रशासन को जहाँ पर वोटबैंक दीखता है पहुँच जाती है चाहे सही हो या गलत|

ajit gupta said...

जब से इस खबर को देख है, तब से यही प्रश्‍न मन में आ रहे थे कि नवाबी को क्‍यों सरकार द्वारा और मीडिया द्वारा नवाजा जा रहा है? मीडिया का रोल बेहद आपत्तिजनक है। उसे इस परम्‍परा का विरोध करना चाहिए था। लेकिन मीडिया तो ग्‍लेमर परोसने पर तुला रहता है। मैंने तो आक्रोश में तुरन्‍त चैनल बदल डाला था।

Ratan Singh Shekhawat said...

इस आयोजन को सिर्फ पगड़ी रस्म तक ही सिमित रखना चाहिए था, नबाबी सौंपना या घोषित करना गलत था | पगड़ी रस्म में बावन गांवों के व्यक्ति,मुख्यमंत्री,मंत्री आदि कोई भी सम्मिलित होता तो शायद ही किसी को बुरा लगता !

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