16 September 2011

भाजपा के महा-रथी अपने रथ की लगाम अब छोड़ें


भाजपा के वरिष्ठ नेता और पिछले लोकसभा चुनावों में पी0एम0 इन वेटिंग के रूप में असफल रहे रथयात्रा के विशेषज्ञ आडवाणी जी एक और रथयात्रा की तैयारी में लग गये हैं। पिछली और सबसे चर्चित रथयात्रा के रूप में उन्होंने हिन्दुओं को जगाने का कार्य किया और बाबरी मस्जिद का विध्वंस सामने आया। बहरहाल उस यात्रा के संदर्भ में कुछ नहीं कहना है क्योंकि कुछ मामलों में हमारा सोचना अलग किस्म का है।

अबकी बार आडवाणी जी ने जिस रथयात्रा का प्रस्तावित स्वरूप सामने रखा है उससे एक बात तो साफ जाहिर होती है कि वे या भाजपा किसी भी रूप में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कार्य नहीं कर रहे हैं बल्कि किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार के मुद्दे के द्वारा सत्ता को प्राप्त करना चाह रहे हैं। अभी-अभी अन्ना के अनशन से हलकान हुई केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार से आम जनमानस का ध्यान हटाना चाह रही है और विपक्ष के रूप में भाजपा चाह रही है कि यदि आगामी चुनावों तक यह मुद्दा जीवित बना रहा तो हो सकता है कि जनता का रुझान भाजपा की ओर हो जाये।

विशेष कुछ न कहते हुए आडवाणी की वर्तमान प्रस्तावित रथयात्रा, जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केन्द्रित कर अभी-अभी जागरूक हुई जनता की सहानुभूति को सम्भावित पी0एम0 इन वेटिंग के रूप में भुनाने का प्रयास मात्र है, पर कुछ सवाल मन में उभरे। इन सवालों को जब स्वयं में देखा और परखा तो लगा कि भाजपा को जमीन से केन्द्र की सत्ता तक पहुंचाने में संघर्ष करने वाले आडवाणी इस बार जनता के साथ छल तो नहीं कर रहे हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई ऐसा तो है नहीं कि अभी और आज ही अचानक खड़ा हो गया हो। इस पर पिछले कई वर्षों से स्वयं भाजपा भी राग अलापती दिख रही है और इसके बाद भी उसकी ओर से कोई ठोस कदम उठते नहीं दिखे हैं। इस बार भी आडवाणी द्वारा और भाजपा के द्वारा कोई ठोस आधार अथवा ठोस कार्यवाही होते नहीं दिख रही है। इसके पीछे कुछ बिन्दुओं को आसानी से देखा-समझा जा सकता है।

भारतीय राजनीति में केन्द्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता रहा है और आज भी जाता है। यही कारण है कि विगत कई वर्ष से प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभरे बाबा भी उत्तर प्रदेश में अपना दमखम दिखाये पड़े हैं। यदि भाजपा को अथवा आडवाणी जी को भ्रष्टाचार को इतना ही ख्याल होता तो जनता की खून-पसीने की कमाई को पार्कों, मूर्तियों में लगते देखकर भी चुप्पी नहीं रहती। स्मारक में पत्थर लगने के नाम पर ऐतिहासिक पर्वतों को काट-काट कर पूरी-पूरी धरोहर को मिटा दिया गया और भाजपा के द्वारा कुछ भी नहीं कहा गया। बहुत पुरानी बात न करें तो अभी हाल ही में भट्टा-पारसौल की घटना हुई, प्रदेश की राजधानी में दो-दो सी0एम00 की हत्या का मामला रहा हो, मंत्रियों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के संकेत रहे हों पर भाजपा के द्वारा कोई सशक्त कदम नहीं उठाये गये।

चलिये मान लें कि केन्द्र की सत्ता का स्वाद चख चुकी भाजपा अब स्वयं को केन्द्र की राजनीति तक ही सीमित रखना चाहती है तो भी केन्द्र में भ्रष्टाचार के मुद्दे कम नहीं थे। ज्यादा दूर जाने की इधर भी आवश्यकता नहीं है, पिछले चार माह में दो बार पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि हो चुकी है, डीजल के दाम बढ़ाये जा चुके हैं पर भाजपा विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करने के बजाय स्वयं को किसी न किसी तरह केन्द्र की सत्ता में काबिज होने की जुगाड़ में लगाये है। मंहगाई, रिश्वतखोरी, आतंकवाद, लूटमार, हत्यायें आदि ऐसी घटनायें हैं जिनसे आज जनता सीधे-सीधे प्रभावित हो रही है। इसके बाद भी महज औपचारिकता के लिए भाजपा कोई धरना प्रदर्शन का नाटक जैसा कर देती है बस।

आडवाणी जी इसके लिए तो तारीफ के हकदार हो सकते हैं कि जिस उम्र में आदमी घर के भीतर पलंग पर पड़ा रह कर अपने नाती-पोतों के साथ आनन्द ले रहा होता है अथवा परिवार से तिरस्कृत रूप में अपनी जिन्दगी को समाप्त करने की गुहार लगा रहा होता है, वे रथयात्रा का संकल्प ले रहे हैं। इसके बाद भी उनकी आकांक्षा, लालसा, तृष्णा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यदि भारतीय जीवन दर्शन में एक सामान्य आदमी अपना सारा राजपाठ अपने बेटों-नातियों को सौंप कर चुपचाप परिवार से सम्मान प्राप्त करता हुआ सुखमय जीवन गुजारता हुआ परमगति को प्राप्त होता है वैसा ही कुछ आडवाणी जी को करना चाहिए। यह तो स्पष्ट है कि उनकी रथयात्रा न तो भ्रष्टाचार को समाप्त कर रही है और न ही किसी सुशासन को ला रही है, साथ ही इतना तो स्पष्ट है कि उन्हें प्रधानमंत्री भी नहीं बना रही है। ऐसे में बेकार की सिरदर्दी वे स्वयं पाल रहे हैं और जनता को भी देंगे क्योंकि उनकी रथयात्रा में बढ़े हुए पेट्रोल का कुछ न कुछ तो व्यय होगा ही, धन का अपव्यय तो होगा ही, जो किसी और का नहीं जनता की कमाई का ही होगा।



1 comment:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कांग्रेस और भाजपा दोनों ही जनता की समस्याओं को हल नहीं हैं। ये तो जनता को लूटने वाले गिरोह हैं।