01 April 2011

बेटियों को मारने में हम अभी भी आगे रहे...


देश की 2011 की जनगणना सामने आ गई है और सामने आ गई बच्चियों को, बेटियों को बचाने की हकीकत। हालत यह है कि देश में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या में मामूली सी बढ़ोत्तरी हुई है। यह वृद्धि इतनी है जिस पर गर्व नहीं किया जा सकता है। इस संख्या वृद्धि पर गर्व न करने का एक कारण तो यह है कि 2001 की जनगणना में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 933 थी जो सन् 2011 की जनगणना में बढ़कर 940 हो गई है।

इसी के साथ जो सबसे अधिक चौंकाने वाला परिणाम सामने आया वो यह कि देश में 0 से 6 वर्ष तक की आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या में गिरावट आई है। सन् 2001 की जनगणना के आधार पर प्रति हजार पुरुषों पर इस आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या 927 थी जो इस जनगणना-2011- में घटकर 914 ही रह गई है। इससे स्पष्ट है के बेटियों को बचाने के लिए जो भी उपाय किये जा रहे थे वे सभी बेकार निकले।

कुल जनसंख्या में महिलाओं की बढ़ी हुई संख्या पर खुश न होने के पीछे का एक प्रमुख कारण 0 से 6 वर्ष तक की बच्चियों की संख्या में कमी आना ही है। यदि इस उम्र की बच्चियों की संख्या में कमी आई है तो महिलाओं की संख्या में वृद्धि कहां से हुई है? इसका सीधा सा तात्पर्य है कि पुरुष मृत्यु दर बढ़ी है तभी तो इस बार की जनगणना में पिछली जनगणना के मुकाबले महिलाओं की संख्या में वृद्धि देखने को मिली है।

बहरहाल महिलाओं की संख्या हमेशा जन्म लेने वाली बच्चियों के द्वारा बढ़ती हुई महसूस की जानी चाहिए जो इस बार तो असफलता ही दिखाती है। यदि पिछली जनगणना के 927 के मुकाबले इस बार की जनगणना में बच्चियों की संख्या 914 रही तो यह चिन्ता का विषय ही है।

यह तो सम्पूर्ण देश की जनसंख्या के आंकड़ों से निकल कर आने वाली संख्या है। इस लिंगानुपात को यदि राज्य स्तर पर देखने का प्रयास किया जाये तो आंकड़ों की वीभत्सता समझ में आती है। पूरे देश में हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, मिजोरम, गुजरात, तमिलनाडु, अंडमान-निकोबार को मिलाकर 35 राज्यों में मात्र 8 राज्य ही ऐसे रहे जिनमें 0 से 6 वर्ष तक की आयु-वर्ग की बच्चियों की संख्या में वृद्धि देखी गई है, शेष राज्यों में कमी ही रही है भले ही वह पिछली जनगणना के मुकाबले एक या दो की रही हो।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक स्थिति प्रदर्शित करने का प्रयास किया है। इसमें लाल रंग भयावहता को तथा हरा रंग कुछ सकारात्मकता को दिखा रहा है। इसमें बच्चियों की संख्या को ही आधार बनाया गया है। महिलाओं की संख्या अधिकतर प्रदेशों में पिछली जनगणना के मुकाबले अधिक रही है।



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5 comments:

Sunil Kumar said...

क्या पिछले छ सालों में यह पाप ज्यादा हुआ है | दुखद परन्तु शत प्रतिशत सत्य!

Arshad Ali said...

हम सभी के लिए चिंता का विषय .....समाज में इस कृत्य को रोकना अत्यंत आवश्यक है...अन्यथा ...................

Meraj said...

har cheez ke liye goverment responcible nahi hoti hamen bhi iske liye kuch karna chahiye
rahi bat ladkiyon ki to gawn men aaj bhi sabse zyada samasya hai aur yaahan par dahej prtha aaj bhi chal rahi hai jiski vajah se samasya ho rahi hai aur gawn men education system bhi bahut accha nahi hai shayad ye wajah bhi ho sakti hai

anshumala said...

अभी कुछ सालो बाद आज किये जा रहे कन्या भ्रूण हत्या का दुखद और भयंकर परिणाम लोगो को समझ आएगा तब वो सिवा पछताने के कुछ नहीं कर पाएंगे | यहाँ तो हल ये है जो राज्य जितना ज्यादा विकसित सम्पन्न है वहा का लिंग अनुपात और भी ख़राब है |

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Sharmnaak.

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क्या ब्लॉगों की समीक्षा की जानी चाहिए?
क्यों हुआ था टाइटैनिक दुर्घटनाग्रस्त?