20 March 2011

असान्जे के समर्थक भी देश-विरोधी हैं हमारी नज़र में


अपनी पिछली पोस्ट में विकीलीक्स और जुलियन असांजे के बारे में लिखा और वर्तमान खुलासे को लेकर अपना विरोध किया था। इस पोस्ट को पढ़कर बहुत से लोगों के विचार सकारात्मक प्राप्त हुए तो बहुतों ने नकारात्मक विचार दिये। बहुतों ने असांजे को पत्रकारिता का असल समर्थक बताया।

चित्र गूगल छवियों से साभार

हमारी तो समझ में नहीं आया कि असांजे किस तरह से पत्रकारिता की रक्षा कर रहे हैं? हो सकता है कि असांजे पत्रकारिता के समस्त सिद्धान्तों का पालन कर रहे हों पर हमारा विरोध सिर्फ इस बात पर है कि क्या किसी भी व्यक्ति को इतना अधिकार किसने दे दिया कि वह हमारे देश की संसद और सांसदों को विश्व समुदाय के समक्ष आरोपी सिद्ध करे?

लोगों की सहमति असहमति को लेकर हमें कोई सफाई नहीं देनी है बस इतना कहना है कि जिसे अपने देश के सदन की इज्जत का ख्याल नहीं, जो व्यक्ति किसी विदेशी के मुंह से देश की बुराई सुनता रहे वह कम से कम अपने को भारतीय होने के दम्भ से बाहर ही रखे।

इस सम्बन्ध में एक बहुत पुरानी कहीं पढ़ा हुआ दृष्टान्त याद आता है जिसमें किसी व्यक्ति ने जापानी से महात्मा बुद्ध और जापान के सम्बन्ध में पूछा गया तो उसने भी जापान के पक्ष में ही अपना मत दिया था। यही कारण है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परमाणु विभीषिका को सहने के बाद भी जापान विश्व-शक्ति बन गया। आज भी इतनी बड़ी विभीषिका सहने के बाद जापान फिर महाशक्ति बनेगा और वो भी अपने नागरिकों की अपार देशभक्ति के कारण।

हम एक विदेशी साइट पर दिये गये कुछ विचारों को अपने ही देश के खिलाफ प्रयोग कर रहे हैं, इससे ज्यादा घिनौनी हरकत और क्या होगी? यह तो और भी घिनौना है कि उस व्यक्ति असांजे के सौ जूते मारने के बजाय हमारे कुछ बुद्धिजीवी--हमारी भाषा में बुद्धिभोगी-- साथी उसका समर्थन करने में लगे हैं।

वाह रे देश और देशवासी! विदेशी की बात पर भरोसा है और हमारे जैसे देशवासी को समर्थन प्राप्त नहीं है। लगे रहो मुन्ना भाई।


4 comments:

Tarkeshwar Giri said...

Apki bat sahi hai, magar Janta ko pata bhi to chalna chahiye ki Unki sarkar kis had tak GIR chuki hai.

संजय कुमार चौरसिया said...

bilkul sahi kaha aapne,

holi parv ki bahut bahut shubh-kaamnaayen

दीपक 'मशाल' said...
This comment has been removed by the author.
दीपक 'मशाल' said...

Chacha ji kshamasahit kahna chaahoonga ki Julian Assange ke samarthan me ek haath mera bhi hai, kaaran kai hain. Is prakran ko deshprem se kahin se bhi nahin joda ja sakta. ise vaishwik patrakaarita ka udbhav maan sakte hain. sachchaai ko saamne laane ke liye raajnaitik seemaaon ki parvaah nahin ki jaati. aap naaraz jaroor honge lekin mere paas paryaapt kaaran hain uske sahi thahraane ke... jab aaunga to aapke saath baithkar vimarsh karoonga aur mujhe vishwaas hai ki aapka haath bhi uske samarthan me khada kar sakoonga.
yah to hamare dharmgranthon ne bhi sikhaya hai ki jab yuddh satya-asatya, dharm-adharm ke beech ho to apne aur paraaye nahin dekhe jaate. sirf achchhe aur bure dekhe jaate hain. Assange ki koi bhi baat hamare bhaarteey patrakaaron ki tarah aadhaarheen nahin hai. ek kadva sach yah bhi hai ki hamare yahan ginti ke hi patrakaar honge jo us vyakti jitni yogyata aur imaandaari rakhte honge.
Mujhe yah bhi vishwaas hai ki satyadrohi hone se deshdrohi hone ko aap bhi behtar hi maanenge..
Itihaas bhi gavaah hai ki har deshdrohi vyakti khalnaayak nahin mana gaya.