14 March 2011

जापान की प्रलयंकारी घटनाएँ सबक हैं---कुछ सीख लो अब तो


सम्भवतः
यह ऐसा विषय नहीं है जिस पर किसी तरह से लिखने की हिम्मत इस समय हो पा रही है। जापान में आई प्रलयकारी स्थितियां किसी भी व्यक्ति को व्यथित कर सकती हैं। पहले भूकम्प की मार उसके तुरन्त बाद ही सुनामी का कहर और अभी एक ही दिन बीता था कि ज्वालामुखी के फटने की खबर। यह सब प्रलय का ही संकेत दे रहीं स्थितियां हैं। इस बात को मीडिया द्वारा प्रचारित वर्ष 2012 के धरती के विनाश से कदापि न जोड़ा जाये।

भूकम्प
और सुनामी से जो नुकसान जापान को हुआ है उससे डरे सहमे लोग इस बात को लेकर ज्यादा सशंकित थे कि उनके परमाणु रियेक्टर आज दोपहर तक सुरक्षित समझे जा रहे थे। दोपहर बाद तो जापान की ही नहीं अपितु समूचे विश्व की नींद उड़ गई जब समाचारों में देखा कि वहां के तीन परमाणु रियेक्टर खराब हो गये हैं। हद तो तब हो गई जबकि यह भी समाचार मिला कि 25 लोग रेडियेशन की चपेट में आ गये हैं।


परमाणु तबाही को साक्षात झेल चुका और किसी न किसी रूप में अभी तक झेल रहा जापान इस बात को भली-भांति समझता है कि परमाणु रियेक्टर के खराब होने का अर्थ क्या है। भूकम्प-सुनामी से तबाही को सहने के बीच संभलने की जापान की कोशिशों को झटका तो लगा ही होगा कि इस झटके को वहां के ज्वालामुखी ने और भी तीव्र बना दिया। दो-दो तरह से तबाही को देखने के बाद अब जापानवासी 4 किमी तक उठते घुंए के बादलों को देख रहे हैं।

इस
तरह की तबाही इंसान को कुछ सिखा पायेगी अथवा नहीं यह तो काल के गर्भ में है पर एक बात तो तय हो गई है कि बार-बार चेताने के बाद भी इंसान ने स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने का भ्रम नहीं छोड़ा और इसका परिणाम आम आदमी ही भोग रहा है। किसी भी रूप में शक्तिशाली बनने की होड़ और उस पर हथियारों का, परमाणु का सहारा लेकर विश्व-सत्ता पर कब्जा जमाने वाली ताकतों को इन घटनाओं से कुछ सीखना होगा।



भूकम्पों को देखते-सहने का आदी हो चुका जापान तकनीकों को विकसित भी कर चुका था किन्तु प्रकृति की विनाशलीला से निजात पा लेना किसी व्यक्ति के वश की बात नहीं है, यह सिद्ध फिर से हो गया है। हथियारों की दम पर, परमाणु बमों के जोर पर समूचे विश्व में दादागीरी दिखाने का दम्भ भरने वाले देशों को इससे सबक मिलेगा और बात-बे-बात तीसरी दुनिया के देशों को, विशेष रूप से भारत को प्रत्येक संकट के लिए दोषी बना देने वालों को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है।

ग्लोबल
वॉर्मिंग, परमाणु रेडियेशन, सुनामी, भूकम्प आदि के खतरों को आमन्त्रण विकसित देश ही देते आये हैं और उनके आने पर दोषारोपण का शिकार तीसरी दुनिया के देशों को होना पड़ता है। बहरहाल, समूचा विश्व अब स्वयंभू सत्ता से बाहर आकर प्रकृति को समझने का प्रयास करे और उसके अनुकूल ही स्वयं को ढालने की कोशिश करे। इंसानियत की, मानवता की, शान्ति की, सुख की और समृद्धि आदि की स्थापना भी इसी के पीछे-पीछे हो सकेगी।

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दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार

2 comments:

दीपक 'मशाल' said...

Behad shaandaar aalekh.. sach hai prkriti to sirf teeli dikhaati hai, baarood ka dher to hum khud sazaaye baithe hain.

Arvind Mishra said...

इससमय सचमुच जापान के घटनाक्रम ने व्यथित कर रखा है और त्रासदी अंतहीन हो चली है !