03 December 2010

कार्यों को महत्त्व देने की जरूरत है, अभी भी शारीरिकता इस पर हावी है


आज विकलांग दिवस को भी मना डाला गया। कुछ औपचारिकताओं का निर्वाह हुआ, कुछ गोष्ठियों का समापन हुआ, कुछ सामान भी बांट दिया गया और हो गई कर्तव्यों की इतिश्री। समाज में आज इस दिन को ही नहीं वरन् किसी न किसी और दिन भी लोगों द्वारा यह दर्शाया जाता रहता है कि विकलांग व्यक्ति किसी से भी कम नहीं है, वह सभी वे सारे काम कर सकता है जो एक साधारण व्यक्ति कर सकता है।

चित्र गूगल छवियों से साभार

साधारण व्यक्ति, विकलांग व्यक्ति........क्या आपको कुछ अन्तर नहीं दिखता है? दिख रहा है न, जब शब्दों में ही इतना अन्तर दिख रहा है तो फिर प्रत्यक्ष रूप में समाज इस अन्तर को कैसे भुला सकता है? समाज कुछ भी कहे, संविधान कुछ भी कहे, व्यक्ति कुछ भी कहें किन्तु सत्यता यही है कि आम आदमी अपने मन में एक अन्तर पाल कर, एक पूर्वाग्रह बनाकर सामान्यजन और विकलांगजन की बात करता है।

इस शब्द को संविधान ने, समाज ने किस तरह और किस रूप में स्वीकारा है यह बात अलग है किन्तु हमारा व्यक्तिगत मत इस शब्द को लेकर अलग है। कोई कुछ भी कहे किन्तु जब एक व्यक्ति विकलांग शब्द की ध्वनि सुनता है तो कहीं कहीं दिल में गहरे तक कष्ट होता है। समाज ने एक चलन बना रखा है कि जो व्यक्ति चलने से, देखने से, सुनने से, हाथों से काम करने से लाचार है उसे सीधे तौर पर विकलांग करार दे दिया जाता है, भले ही वह आदमी किसी आम आदमी से ज्यादा अच्दा और गुणवत्तापूर्ण कार्य कर रहा हो।

इसके समर्थन में बस एक ही उदाहरण देना चाहेंगे कि स्टीफन हॉकिंस का नाम तो आप सभी ने सुना होगा। भौतिकी के क्षेत्र में कार्य कर रहे इस वैज्ञानिक की मात्र एक उंगली ही कार्य करती है और वह इसी उंगली के सहारे ब्राहाण्ड के जन्म पर खोज करने हेतु महामशीन को शुरू कर चुके हैं। क्या इस वैज्ञानिक को मात्र उसकी शारीरिक अक्षमता के कारण विकलांग कह देना उचित रहेगा?

जहां तक विकलांग होने का सवाल है तो इस शब्द की शाब्दिक व्याख्या की जाये तो स्पष्ट होता है कि जो किसी न किसी रूप में किसी अंग से विकल है वही विकलांग हुआ। इस शाब्दिक अर्थ को ध्यान में रखकर गौर करें तो समाज का बहुत बड़ा वर्ग विकलांग कहलायेगा। चश्मा लगाने वाला भी विकलांग, हकलाने वाला भी विकलांग, छड़ी लेकर चलने वाला भी विकलांग, जिसका पेट खराब रहता हो वह भी विकलांग, गंजा आदमी भी विकलांग हुआ किन्तु समाज का ध्यान इस ओर नहीं जाता है।

यह सम्भव है कि प्रत्येक वह व्यक्ति जो किसी न किसी रूप में अपनी शारीरिक क्षमताओं का पूर्णरूप से प्रयोग नहीं कर पा रहा हो उसे विशेष रूप से सहयोग देने की जरूरत हो सकती है। इस तरह की मदद, सहयोग को ऐसे व्यक्तियों को प्रोत्साहन देने की नीयत से होना चाहिए कि उन पर कोई एहसान करने की दृष्टि से। पता नहीं समाज में किसी क्रियाशील व्यक्ति के कार्यों की अपेक्षा उसकी शारीरिकता को महत्व देना कब कम होगा?

किसी व्यक्ति को मात्र शारीरिक अक्षम होने के कारण नहीं वरन् उसकी प्रतिभा को महत्व देकर प्रोत्साहन अवश्य दें।


2 comments:

Mithilesh dubey said...

अन्तिम लाईन बहुत कुछ कह रही है ।

योगेन्द्र मौदगिल said...

सार्थक आलेख,साधुवाद...