14 December 2010

राजनीतिक भ्रष्टाचार अपने चरम पर है


आजकल लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाये और क्या न किया जाये? यह स्थिति किसी आम आदमी की अकेले नहीं है, यह समस्या हर वर्ग के साथ है।

जो सम्पन्न हैं उनके साथ समस्या है कि अपनी सम्पन्नता को और कैसे बढ़ाया जाये। कैसे अपनी सम्पन्नता और वैभव के दम पर चारों ओर अपनी हनक को जमाया जाये। किस तरह अपनी इस हनक के सहारे से सत्ता को प्राप्त किया जाये।


चित्र गूगल छवियों से साभार

इसी तरह जो सम्पन्न नहीं हैं और सम्पन्नता को पाना चाहते हैं वे भी कोई न कोई जुगत भिड़ाने में लगे रहते हैं। रोजी-रोटी की जुगाड़ में लगे रहते हैं।

सम्पन्नता और अभाव से अलग एक और वर्ग है जिसे पिछले कुछ समय से देश में सर्वाधिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है। इस वर्ग में राजनीतिक लोगों को रखा जा सकता है, ऐसे राजनीतिज्ञों को जो किसी न किसी रूप से सत्ता के आसपास मंडराते रहते हैं। यह वह वर्ग है जो किसी न किसी रूप से सत्ता का दुरुपयोग करके स्वार्थ पूर्ति में लगा रहता है। यही वह वर्ग है जो देशहित की बात बड़े-बड़े मंचों से करता है किन्तु मौका आने पर देश विरोधी कार्यों में संलिप्त हो जाता है।

ऐसे वर्ग के लिए किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं है। संसद के वर्तमान सत्र में जो भी हुआ उसके द्वारा इसको आसानी से समझा जा सकता है। पूरे सत्र में संसद का कार्य ठप्प रहा और अरबों के नुकसान के बीच सत्ता पक्ष और विपक्ष एकदूसरे पर दोषारोपण करने में लगा है। पूरे घटनाक्रम को आपके सामने रखने की जरूरत नहीं है, आपने खुद सब देखा और समझा होगा।

भ्रष्टाचार और घोटालों की दुनिया में किससे साफगोई की उम्मीद की जाये। एक अपने कॉलर को खड़ा करके दूसरे को दोष देना शुरू करता ही है कि अगले ही क्षण उसके कॉलर में भी कालिख दिखनी शुरू हो जाती है। कालिख को पोते एकदूसरे को गाली देने, दोष लगाने के बीच देश के आम आदमी का कितना धन बर्बाद हो रहा है इस बात की कोई फिक्र किसी को भी नहीं रही।

इस तरह के संसदीय व्यवधान के मध्य एक बात स्पष्ट रूप से समझ आती है कि अब जनप्रतिनिधियों को बापस बुलाने का तरीका भी लाना होगा। जो जनप्रतिनिधि अपनी जनता का और उसके धन का ख्याल न कर सके, उन्हें किसी भी रूप में जनप्रतिनिधि के रूप में बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

संसद सत्र के बेकार निकल जाने और धन के अपव्यय के बीच खबरें इस तरह की भी आ रहीं हैं कि अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश में सम्पन्न जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावों में एक-एक वोट को अपने पक्ष में गिरवाने के लिए कई-कई लाख रुपयों का आदान-प्रदान हुआ साथ में लक्जरी कार की भी व्यवस्था की गई थी। एक अनुमान लगाया जा रहा है कि एक-एक सदस्य की कीमत 40 लाख तक लगाई गई है।

कुछ इसी तरह की बात करते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी अभी टी0वी0 पर दिखाई दिये थे। वे तो संसद के सर्वोच्च सदन को ही इस तरह के लेन-देन का दोषी साबित कर रहे थे। यदि किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री खुलेआम मीडिया के सामने इस तरह की बात कर रहा हो तो उसमें कुछ न कुछ सच्चाई तो होगी ही। इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

निराश करने वाली इस तरह की खबरों के बीच से बिहार से एक सुखद सी खबर सुनाई दे रही है कि वहां विधायक निधि को समाप्त करने के सम्बन्ध में विधायिका में आम सहमति सी बनती दिख रही है। चलिए शायद बिहार से ही देश में राजनीतिक स्वच्छता की कोई राह निर्मित हो सके। हम जनता तो बस इसी आशा के सहारे अपना लोकतन्त्र संभाले खड़े हैं।

यहाँ आकर ये कविता --- कहाँ से चले थे, कहाँ गए हैं ---- भी पढ़ते जाइएगा


1 comment:

दीपक 'मशाल' said...

sabka kachcha chittha sa hai ye..