20 अप्रैल 2010

अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही पानी बचाइए!!!



अभी अप्रैल माह पूरी तरह से बीत भी नहीं पाया है कि गरमी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिये हैं। पारा अभी से 47 से ऊपर जाने लगा है। समाचार-पत्रों के अनुसार मानिकपुर (चित्रकूट) में पारा 49.3 तक जा पहुँचा था। गरमी की इस विकट और भयावह स्थिति के साथ-साथ बिजली का संकट आन पड़ता है। इसी के साथ गरमी की भयावहता के बीच एक और संकट से जनता का सामना होने लगता है। वह संकट है पानी का संकट।



मीडिया ने देश भर में पानी को लेकर उत्पन्न होने वाले संकट को दिखाया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र आदि में तो जल-संकट को लेकर होने वाली मारामारी भी दिखा दी गई। हो सकता है जिन इलाकों में अभी भी पानी को लेकर इतना संकट व्याप्त न हुआ हो कि पानी को लेकर मारपीट की नौबत हो, जल-संसाधनों पर पहरा बिठाने जैसे हालात हों, वहाँ ऐसे समाचारों पर कान भी नहीं दिया जाता। जबकि हालात वाकई ऐसे ही हैं।

ऐसे समाचारों को लेकर तो हम मीडिया का समर्थन करते दिखेंगे कि यहाँ किसी प्रकार की टी0आर0पी0 का चक्कर नहीं है। पानी को लेकर हमारे क्षेत्र में (बुन्देलखण्ड) तो भयंकर मारामारी की स्थिति बन जाती है। पिछले वर्ष तो नहरों के पानी की सुरक्षा के लिए प्रशासन को पहरा बिठाना पड़ा था। जल संस्थान की ओर से पानी का संकट झेल रहे इलाकों में पानी की आपूर्ति के लिए भेजे जाने वाले टैंकरों को पुलिस की सुरक्षा में भेजा जाता था। इसके बाद भी एक-दो स्थानों पर पानी को लेकर हिंसा इस हद तक हो गई कि कुछ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

कुछ इसी तरह की मारामारी की स्थिति महाराष्ट्र में दिखाई जा रही है, राजस्थान में कुछ इलाकों में लोग पानी की सुरक्षा करते दिखाये गये हैं। हालात बड़े ही भयावह हैं और हम हैं कि चेतने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। जिनके पास पानी की कमी है वे तो किसी न किसी तरह जुगाड़ करके पानी का इंतजाम कर रहे हैं और जिनके पास पर्याप्त जल है वे उसे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं उठा रहे हैं।

कई आलेखों में और कई संगोष्ठियों में सुनते आये हैं कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। जब ऐसा पहली बार सुना था तो बड़ी हँसी आई थी किन्तु अब हँसी नहीं आती वरन् चिन्ता होने लगी है। हम जिस प्रकार से संसाधनों का विदोहन करते चले जा रहे हैं और उनके संरक्षण पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, वह हमारे लिए घातक है। हमें इस प्रवृत्ति को त्यागना होगा कि कौन सा हमें इस कठिनाई को सहना है। हमारे पास कहाँ किसी चीज की कमी है।

माना कि आज हमारे पास किसी की कमी नहीं है पर क्या आने वाले वर्षों में भी यही स्थिति बनी रहेगी? इस सवाल के जवाब में चाहते-न चाहते हुए भी सभी ‘न’ की मुद्रा में ही दिखते हैं। यदि हम आने वाले दिनों की भयावहता को जानते-समझते हैं तो फिर शुरूआत आज से और अपने आपसे ही क्यों नहीं करते हैं?

पिछले दिनों ब्लॉगप्रहरी के लिए एक साक्षात्कार में ब्लॉगिंग की सामाजिकता को लेकर सवाल किया गया था, यही ब्लॉग की सामाजिकता है कि हम किस तरह एक पल में अपने विचारों को सभी के साथ बाँट सकते हैं। जल संरक्षण को लेकर हम अपने-अपने ब्लॉग पर कुछ न कुछ अवश्य लिखें और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक प्रचारित करें।

यह अपील उन ब्लॉगर्स से भी है जो अपनी एक-एक पोस्ट पर टिप्पणी पाने के लिए मेल भेज-भेज कर नाक में दम कर लेते हैं, कि वे जल संरक्षण पर भी लोगों को मेल भेज-भेज कर नाक में दम कर लें। ऐसे संवेदनशील विषय पर नाक में दम कर लेने पर कोई बुराई नहीं।


अरे! जब हमारे ब्लॉगर्स बाघों को बचाने के लिए पूरा जोर लगा सकते हैं तो क्या पानी की एक-एक बूँद बचाने को मेहनत नहीं कर सकते हैं? बाघ बचाने में आपका लेख पता नहीं कितना काम आया पर हमें इस बात का सौ फीसदी से ज्यादा (यदि ऐसा होता हो तो) यकीन है कि जल संरक्षण के लिए आपका लिखा एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य, एक-एक आलेख अवश्य की काम में आयेगा।

अपने लिए न सही पर अपने बच्चों के भविष्य के लिए ही सही, कम से कम एक बार पानी बचाने की कोशिश करके तो देखो।







(दोनों चित्र गूगल छवियों से साभार)

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