13 February 2010

‘खातव्यम् तो मरतव्यम्, न खातव्यम् तो मरतव्यम्, ताक धिना-धिन क्यों करतव्यम्

चलिए, देश के सिर पर आया एक बहुत बड़ा संकट टल गया। शाहरुख खान की फिल्म माई नेम इज खान शिवसेना के लाख विरोध के बाद भी आखिरकार रिलीज हो ही गई।


(चित्र गूगल छवियों से साभार)
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हम सभी के लिए यह गौरवशाली क्षण है क्योंकि यदि यह फिल्म अपने समय पर रिलीज नहीं हो पाती तो देश के बहुसंख्यकों के समकक्ष होने के बाद भी अल्पसंख्यक के रूप में देश में चिन्हित एक बहुत बड़े वर्ग के दिल को ठेस लगती। हम प्रसन्न हैं कि देश में चाहे आम आदमी की सुरक्षा न हो पाये किन्तु वर्ग विशेष के, धर्म विशेष के किसी भी एक व्यक्ति के पोस्टर तक को कोई न फाड़ सके।

यही तो हम भारतवासियों की दरियादिली है कि अपने दर्द को भले ही कम न कर सकें किन्तु दुनिया जहान के दर्द को कम करने का दम भरते घूमते हैं।


विडम्बना देखिये, जिस व्यक्ति की फिल्म की रिलीज के लिए मुम्बई में हंगामा कटा रहा, महाराष्ट्र सरकार के साथ-साथ देश की सरकार के प्राण भी हलकान रहे, लोगों की नींद उड़ी रही, फिल्म अभिनेता शाहरुख खान की पुत्री को तो देश तक छोड़ने की चिन्ता हो गई थी, वह व्यक्ति अपनी फिल्म की रिलीज के समय इस देश में नहीं था। फोन करके उसने इस देश के बेवकूफ प्रशंसकों से कह दिया कि वह सभी मुम्बईकरों से माफी माँगता है कि उन्हें कष्ट हुआ पर स्वयं इतने कष्ट के बाद भी विदेश से धन की ज्यादा से ज्यादा उगाही में लगा हुआ है।

चलिए कोई बात नहीं, फिल्म रिलीज हो गई और मीडिया की निगाह में शिवसेना हार गई। अब फिल्म की नहीं कुछ मीडिया की बात हो जाये जो देश के विकासपरक कदमों में अपना भी कदम मिलाने का प्रयास करता है किन्तु उसके अनाड़ीपन से वह कदम तो नहीं मिल पाता, हाँ समाज के विकासपरक कदमों में अड़ंगा जरूर लग जाता है।

मीडिया अब कहती घूम रही है कि शिवसेना जीत गई और खान जीत गया। यदि इस रिलीज के समय कोई हादसा हो जाता तो मीडिया शिवसेना की नाक में दम तो करती ही, देश के तमाम सारे हिन्दुओं की (जो अपने देश में ही अल्पसंख्यकों से बदतर हैं, इसी मीडिया के कारण) खाट खड़ी कर देती। भला हो कि ऐसा कुछ नहीं हुआ।

मीडिया स्वयं में हमेशा ऊहापोह की स्थिति में रहती है कि क्या करे और क्या न करे? क्या कहे और क्या न कहे? 6 दिसम्बर आता है और आराम से गुजर जाये तो उसकी बकवास शुरू कि भाजपा, विहिप और अन्य हिन्दू संगठन शान्त रह गये, वे सभी मंदिर मुद्दे को भूल गये, आदि-आदि।

कुल मिला कर कहने का तात्पर्य यह कि कुछ करो तो मरना है और न करो तो मरना है। इसी स्थिति को कहा जाता है ‘खातव्यम् तो मरतव्यम्, न खातव्यम् तो मरतव्यम्, ताक धिना-धिन क्यों करतव्यम्।’

जो हुआ अच्छा हुआ, तुष्टिकरण की नीति फिर सफल रही। इस नीति से तो अभी तक देश में सरकारें कायम हैं तो फिर एक फिल्म के कायम रहने में किसे संशय था। शाहरुख खान इसी से तो देश के बाहर कमाई में मगन है क्योंकि उसे मालूम हैं कि उसके प्रशंसक जान लड़ा देंगे, जान गँवा देंगे और यह सब भी सफल नहीं हो पाया तो फिर सरकार तो है ही जो तुष्टिकरण के नाम पर एक फिल्म तो रिलीज करवा ही देगी।

जय हो.............जय हो......... (स्लमडाग का गाना नहीं गा रहे हैं, जय-जय मना रहे हैं)



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