17 December 2009

बलात्कार के लिए समूचा पुरूष समाज दोषी नहीं


बलात्कार की चर्चा और समूचे पुरुष वर्ग के ऊपर उँगली न उठे यह कैसे सम्भव है? महिला के साथ बलात्कार करने वाला पुरुष समाज के हिस्से के रूप में तो आ सकता है किन्तु उसे समूचे पुरुष समाज का प्रतिनिधि नहीं समझा जाना चाहिए।

छेड़छाड़, बलात्कार, यौन शोषण आदि की तमाम सारी घटनाओं के होने के पीछे पुरुष मानसिकता को दोषी मान लिया जाता है, जबकि यह पूर्णतः सही नहीं है। बलात्कार के पीछे का मनोविज्ञान कठिन भले ही हो किन्तु उसे समझना कदापि कठिन नहीं लगता है।

बलात्कार के पीछे मन की विकृत भावना तो काम करती ही है साथ ही समाज में चल रहे यौन उन्मुक्त व्यवहार की भी भूमिका को कम करके नहीं आँका जा सकता है। महिला-पुरुषों का आपस में घुलमिल कर कार्य करना भले ही उनके आपसी सम्बन्धों में यौन को, सेक्स को शामिल नहीं करता हो किन्तु उनके आसपास के लोग किसी भी स्त्री-पुरुष के मध्य सिर्फ और सिर्फ सेक्स सम्बन्धों को तलाशते हैं। यही खोजबीन ही दोषी को यौन अपराध की ओर ले जाती है। इसके अतिरिक्त विपरीत लिंगी की ओर से मिलती उपेक्षा के चलते भी इस तरह के अपराधों को बल मिला है।

परिवार में पति-पत्नी के मध्य के शारीरिक सम्बन्धों में मधुरता की कमी ने भी पुरुष को तथा स्त्री को अवैध सम्बन्धों की ओर मोड़ा है। ऐसी स्थिति में भी बलात्कार जैसे अपराध समाज में देखने को मिलते हैं।

सवाल यह उठता है कि क्या समाज से बलात्कार कम नहीं होंगे या फिर समाप्त नहीं होंगे? जवाब खोजते समय हम इस अपराध की जड़ तक पहुँचने का प्रयास नहीं करते हैं। जिस तरह से अब हमारी जीवनशैली होती जा रही है वहाँ पर हमने सम्बन्धों की, रिश्तों की गरिमा को समाप्त सा कर दिया है। घरों में भी हम एक दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना रखने लगे हैं। इसके ठीक उलट अब वह समाज देखने को नहीं मिलता है जहाँ मोहल्ले में लड़के-लड़कियों के मध्य भाई-बहिन सा स्नेह हुआ करता था। हालात ये हैं कि अब घर के भाई-बहिनों को भी शक की निगाह से देखा जाता है।

महिला हिंसा को रोकने का सबसे आसान तरीका आपसी प्रेम-स्नेह को पुनः स्थापित करना ही है। सम्बन्धों और रिश्तों में आती कड़वाहट से ही अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। इन्हीं अपराधों के मध्य विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति महिलाओं को अपना निशाना बना लेते हैं।

कहा भी गया है कि अपराधी हमेशा कमजोर कड़ी पर वार करता है। महिलाएँ शिक्षित होने के बाद भी स्वयं को कमजोर मानकर ही अपने कार्य को अंजाम देतीं हैं। उन्हें स्वयं अपनी ताकत को समझना होगा साथ ही भावनात्मकता से परे सामने वाले की मानसिकता को भी परखना होगा।


समूचा पुरुष वर्ग महिला विरोधी नहीं है, समूचे पुरुष बलात्कारी मानसिकता वाले नहीं हैं, सभी पुरुषों के मन में नारी देह की लालसा नहीं है कुछ इस तरह की सोच रखकर भी पुरुष समाज को अपना मानना होगा। यह भी समझना होगा कि इन्हीं अच्छे सोच वाले पुरुषों की नकल करके कुछ विकृत मानसिकता वाले पुरुष महिलाओं को अपना निशाना बनाने को तैयार बैठे हैं। बचना इन्हीं से है और पहचानना भी इन्हीं को है।

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वर्ग के रूप में पुरुष दोषी नहीं है लेकिन यह पुरुष प्रधान व्यवस्था लोगों को इस मानसिकता से भर देती है। निश्चय ही वह दोषी है।

Udan Tashtari said...

द्विवेदी जी कह गये हमारी बात!

"नाइक की टिप्पणी को कार्यवाही में से निकाल दिया" said...

aap jo keh rahey haen usko sansad mae naaik nae kehaa haen aur us tippini ko sansad ki minutes mae bhi darj nahin kiya gaya ab aap ko yae post rakhni chahiyae yaa hataani yae aap ki apni soch par haen

परमजीत बाली said...

विचारणीय पोस्ट।

Dr. Mahesh Sinha said...

यह एक परिस्तिथीजन्य अपराध है . इसमें जगह , काल और सोच का बड़ा सम्बन्ध है