04 November 2009

विचारों की प्रासंगिकता क्यों और किसके लिए होती है??

तीन सौ पोस्ट डेढ़ वर्ष में ही करने का हमारा लालच और मेल के द्वारा हमें मिला आदेश। यही कारण है कि आज दो पोस्ट लिखने के बाद भी इस पोस्ट को लिखने बैठ गये।
देखा जाये तो हमारे आसपास इतना कुछ होता रहता है कि प्रतिपल एक पोस्ट लिखी जा सकती है। अभी शाम को हम मित्र आपस में चर्चा कर रहे थे और चर्चा भी होने लगी एक ऐसे विषय पर जो आये दिन हमारे सामने से गुजरता है। किसी भी ‘महान व्यक्ति के विचारों की प्रासंगिकता’, यह ऐसा विषय है जो प्रासंगिक न होने के बाद भी प्रासंगिक है।
हम जब भी किसी व्यक्ति की जयंती आदि मनाते हैं तो उसके विचारों को याद करते हुए उसके विचारों को आज के लिए भी प्रासंगिक बताते हैं। अब प्रासंगिकता किस संदर्भ में होती है, यह समझ से बाहर हो जाता है। माना कि गाँधी जी के विचारों को ही लें, गाँधी जी को याद करते हैं और कहते हैं कि आज भी गाँधी जी के विचार प्रासंगिक हैं।
यदि प्रासंगिक हैं तो कौन मान रहा है? मात्र यह समझना कि आज यदि अहिंसा, प्रेम, भाईचारे को अपनाया जाये तो समाज में शांति रहेगी, सत्य हो सकता है किन्तु अपनाये कौन?
एक तरफ हम भाषण देकर निकले और दूसरी ओर लग गये हिंसा, अत्याचार, नफरत को फैलाने में। समझना होगा कि महान व्यक्तियों के विचार क्या किताबों, भाषणों, कार्यक्रमों आदि तक ही प्रासंगिक हैं? यदि ऐसा है तो यह कहना गलत है कि आज भी विचार प्रासंगिक हैं।
हाँ, हमारी दृष्टि में विचारों की प्रासंगिकता उस समय तक है जब तक कि स्वयं को समाज में स्थापित करना होता है, लोगों के बीच में स्वयं को बुद्धिजीवी सिद्ध करना होता है। चलिए ऐसा ही अपने आपको ब्लाग संसार पर सिद्ध करने के लिए हम भी कहे देते हैं कि फलां-फलां के विचार ब्लाग संसार में आज भी प्रासंगिक हैं।
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विशेष---अगले एक-दो घंटे में एक और पोस्ट को सहना पड़ेगा आप सभी को, आखिर तीन सौ का सवाल है। कृपया सहन कर लीजियेगा।
चित्र गूगल से साभार लिया गया है....

2 comments:

cmpershad said...

तीन सौवीं पोस्ट के लिए अग्रिम बधाई:) अब हम चैन से सो सकते हैं जी!!

Dr.Aditya Kumar said...

जिस प्रकार आदर्श यथार्थ का मार्गदर्शन करते हैं पर यथार्थ व्यावहारिक होकर ही आदर्शों को ग्रहण करता है ,वैसी ही स्थिति मुझे महापुरुषों के विचारों की प्रतीत होती है ,