26 October 2009

घरों के भीतर भी घरों का बनना

इस धनतेरस पर अपनी अम्मा जी के लिए नया टी0वी0 हम भाइयों ने खरीदा। हमारे कमरे में और हमारे छोटे भाई के कमरे में अपना-अपना टी0वी0 है। अम्मा जी अपने मनपसंद कार्यक्रम अपनी दोनों बहुओं के साथ बैठ कर देख लेतीं। सुबह के समय को छोड़ कर अन्य किसी समय में कार्यक्रम देखने की दिक्कत उसी समय होती है जब किसी सीरियल अथवा कार्यक्रम को देखने में तीनों लोगों की एकराय नहीं हो पाती है।

सुबह अम्माजी को ही दिक्कत होती थी, वो भी इस कारण से कि अम्मा जी जल्दी उठने वालों में से हैं, शेष हम लोग थोड़ी देर से बिस्तर छोड़ने में विश्वास करते हैं। इस कारण से सुबह के समय अम्मा जी का इधर-उधर टहलना होता रहता था। हालांकि हमारे घर में कभी टी0वी0 के कार्यक्रमों को लेकर बहस-विवाद की स्थिति नहीं बनी पर कभी-कभी शाम को कार्यक्रमों के निर्धारण में असमंजस की स्थिति को बनते देखा गया।

अम्मा का सुबह का खालीपन और शाम के समय की असमंजसता को देखकर इस बार विचार किया गया कि अम्मा के कमरे में भी टी0वी0 हो। बस टी0वी0 आ गया अम्मा के कमरे में।

यहाँ विशेष बात टी0वी0 का आना नहीं रहा, विशेष हमें यह लगा कि अब एक घर में एक परिवार और उस एक परिवार में कई घर और उन कई घरों के बीच भी कई घर बन गये हैं। आप ही देखिये, हमारा एक ही घर, एक ही परिवार, उसमें एक अम्मा का, एक हमारा, एक भाई का घर अथवा परिवार बन गये हैं। कुल जमा सात-आठ लोग और टी0वी0 तीन।

पहले एक ही टी0वी0 था और हम कई लोग एकसाथ मिलकर देख लेते थे। यह स्थिति तमाम सारे चैनल आने के बाद भी रही। अब..............

यह एक हमारे घर की ही नहीं, घर-घर की कहानी है। समझ नहीं आया कि ये समाज का, परिवारों का विकास है अथवा विघटन? यह हमारे संस्कार का क्षरण है अथवा चैनलों का संवर्धन? यह हमारी संकुचित मानसिकता का परिचायक है अथवा हमारे वैश्वीकरण का प्रतीक?

3 comments:

Udan Tashtari said...

घर-घर की कहानी है-सच कह रहे हो मित्र.

शरद कोकास said...

हमारे घर मे एक भी टीवी नही है हम लोग बहुत सुखी हैं ।

Shobhna Choudhary said...

Bahut hi SATIK likha aapne...T.V. kafi haad tak Zimedar hai parivar ke bich mein khatam hote pyar ke liye....