19 September 2009

एक बेचारे पर सभी पिल पड़े हैं, ग़लत बात

एक बेचारा शशि थरूर, एक बयान क्या दे दिया सब के सब उसके पीछे हाथ-पैर धोकर या कहें कि नहा धोकर उसके पीछे पड़ गये हैं। पार्टी अलग उसके पीछे पड़ी है, अब तो पड़ना भी चाहिए क्योंकि मैडम भी इकोनोमी क्लास की यात्री हो चुकीं हैं। उन्हें देखादेखी लत पड़ गई सभी को इकोनोमी क्लास में यात्रा करने की। मुश्किल तो ये लगता है कि कहीं अब इकोनोमी क्लास का किराया ही न बढ़ा दिया जाये? (वैसे हमें क्या, अभी तक हवाई जहाज छूकर भी नहीं देखा, बैठना तो दूर। हाँ खिलौने वाले तो बहुत उड़ाये और तोड़े हैं।)

बात हो रही थी शशि थरूर की। उसके बयान पर हंगामा क्यों? वही पुरानी गजल, हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है। यहाँ लाल और पीली का सवाल ही नहीं सवाल था जो कहा उस पर हंगामा क्यों? कौन थे शशि थरूर इस चुनाव को जीतने के पहले? कभी सोचा? नहीं न....

यही मुश्किल है इस देश के लोगों के साथ, किसी को दो-चार जगह किसी भी रूप में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर देख क्या लें समझो हो गये पागल उसके पीछे। वही अब खुदा, वही भगवान। कहते हैं न कि जब खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान, कुछ ऐसा ही हुआ महाशय के साथ। दो-चार खबरें बनी अन्तरराष्ट्रीय स्तर की और आ गये भारत वर्ष में अपनी झींगा-मुश्ती करने।

पूरा दोष इन जैसे लोगों का नहीं है। हम भी तो उसी के लिए पलक-पाँवड़े बिछा कर तैयार रहते हैं जो अपने धन-बल से रसूख से हमें प्रभावित करता रहता है। हमने चुनाव में शायद ही किसी के विकास कार्यों को देखा हो (अपवाद स्वरूप कुछ उदाहरण यहाँ मौजूद हैं) हमने जब भी चयन करना चाहा तो देखा कि कौन ‘काम’ करवाने में सक्षम है? कौन हमारे दो नम्बर के कामों को एक नम्बर का बनवा देगा? किसके साथ बन्दूक वालों की भीड़ है? किसके पास लग्जरी कार है? किसका नाम किसी भी रूप में सही, ज्यादा से ज्यादा लोग जानते हैं?

अब कोई माने या न माने सत्य यही है। कोई बताये देश के लिए शशि थरूर का योगदान? ऐसे व्यक्ति को जिसने देश के आम आदमी की पीड़ा को नहीं देखा समझा उसे तो इकोनोमी क्लास वाला यदि जानवर लग रहा है तो भी उसका शुक्रिया अदा करो। ये कहो कि उसने आम आदमी को कुछ और नहीं कहा क्योंकि देश की बहुत बड़ी जनसंख्या रेलवे के साधारण श्रेणी के डिब्बे में बैठ कर यात्रा करती है। साधारण श्रेणी का डिब्बा क्या थरूर साहब जानते होंगे?
रही बात आम आदमी के दर्द की तो जो इस देश में जन्में और पीड़ा को सहा, अभावों को देखा, वही करोड़ों के बँगले में रहते हैं, लाखों की कार में यात्रा करते हैं, अरबों रुपये पत्थरों के नाम करते हैं तो विदेश के रंग-ढंग में पले शशि थरूर पर इतना गुस्सा क्यों?

3 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

उन्होंने ऐसा क्या कह दिया जी?

हम तो यूपी में बैठे देश की अदालतों का कहा सुन रहे हैं जो देश और प्रदेश के नेताओं से उनकी धाँधली का जवाब तलब कर रही है।

ये लोग भी न...।

डॉo लखन लाल पाल said...

suno gaur se NETA logo, buri najar tum ham par dalo....
YE TUMHARA JANMSIDDH ADHIKAR HAI.

शिवम् मिश्रा said...

जन्म-दिन की बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाए :)