30 July 2009

बात-बेबात राय देने वालों का क्या करें?

अधिकतर देखने में आता है कि किसी भी बात को, वस्तु को, व्यवस्था को बनाने में बहुत मेहनत लगती है। इस मेहनत के ठीक उलट उस व्यवस्था अथवा निर्मित वस्तु को बिगाड़ने में, उसमें कमी निकालने में किसी प्रकार का समय नहीं लगता है। इसी तरह जितने जतन से उस व्यवस्था का निर्माण होता है, उसी के ठीक उलट बड़ी ही आसानी से सलाहों की पेटी थमा दी जाती है।
देखा जाये तो यह हमारे देश की व्यवस्था की पहचान बन गई है। राजनीति हो या समाज के किसी भी छोटे से तबके का सवाल, सभी जगह इस स्थिति को देखा जा सकता है। वृहद स्तर पर राजनीति में देखा गया है कि किसी प्रकार की विदेश नीति सम्बन्धी, देश हित सम्बन्धी, बजट सम्बन्धी निर्णय हों या फिर कोई भी बात, वे लोग भी अपनी राय देते दिखते हैं जिन्हें इन सबका ककहरा भी ज्ञात नहीं होता है।
अहम से अहम मुद्दों पर ऐसी राय दी जाती है मानो हम से अच्छा विचारक कोई है ही नहीं। ऐसा ही समाज में होता है। आपको कोई काम करना है मिस्टर फलां से पूछिए चाहे न पूछिये, उन्हें तो अपनी राय देनी है। घर का बड़े से कड़ा सामान आना हो या फिर छोटे से छोटा कोई काम हो ये रायचन्द टाइप (जिसका नाम रायचन्द हो वो क्षमा करे) लोग अपनी राय देने हाजिर।
अब आप मानो या न मानो ये तो राय देते ही रहेंगे। आपकी किस्मत कि इनकी राय से आपको कितना लाभ और कितनी हानि हो रही है। बहुत कुछ न कहेंगे, इन्हीं रायचन्दी टाइप लोगों के कारण किस तरह की स्थिति बनती है, इसका एक छोटा सा उदाहरण।

एक आदमी ने मिठाई की दुकान खोली। दुकान के ऊपर बोर्ड लगाया - ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’
उद्घाटन हुआ नहीं कि एक रायचन्द जी पधार गये। बोर्ड पर निगाह मारी और बोले - ‘‘क्यों, इस बोर्ड पर यह ‘यहाँ’ क्यों लिखा रखा है? जब दुकान यहीं है तो यहाँ की क्या जरूरत? इसे मिटवाओ।
दुकान वाले को लगा कि बात तो सही है। जब दुकान यहीं है तो यहाँ लिखा होने की क्या जरूरत? उसने बोर्ड से यहाँ मिटवा दिया।
दो-तीन दिनों में एक और राय देने वाले आ पहुँचे। बोर्ड पर निगाह गई। अब लिखा था - ताजी मिठाई मिलती है।
बोले - ‘‘ये ताजी क्या होता है? क्या मिठाई बासी भी बेचते हो? या दूसरे लोग बासी मिठाई बेचते हैं? मिठाई तो तुम ताजी ही बेचते हो, इस शब्द को मिटवाओ।
दुकान वाले ने सोचा कि बात तो सही है। मिठाई तो ताजी ही बेच रहे हैं फिर ताजी लिखने की क्या जरूरत? उसने उस शब्द को भी मिटवा दिया।
अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिठाई मिलती है।’’
दो-चार दिन बाद एक और महाशय पधारे राय देने। बोर्ड देखा और बोले -‘‘क्या भाई! तुम केवल मिठाई ही तो बेचते हो फिर इसे लिखने की क्या जरूरत है? हाँ, मिठाई के अलावा और भी कुछ बेच रहे होते तो लोगों को बताने की जरूरत थी। इसे हटवाओ।’’
मिठाई वाले ने सोचा कि ये बात भी सही है। हम तो केवल मिठाई ही बेचते हैं तो इसे लिखवाने की क्या जरूरत? उसने मिठाई शब्द भी मिटवा दिया। अब बोर्ड पर लिखा था -‘‘मिलती है।’’
कुछ दिन बीते एक और राय देने के लिए आ टपके। बोर्ड की ओर ताकते ही बोले -‘‘इतना बड़ा बोर्ड और केवल इतना लिखा है ‘मिलती है।’ अरे! मालूम भी तो चले कि क्या मिलता है। इस बोर्ड पर लिखवा दो ‘‘यहाँ ताजी मिठाई मिलती है।’’

दुकानदार अपना सिर पीट कर रह गया। अब आप ही बताओ कि वो क्या करे ऐसे रायचन्दों का या फिर हम क्या करें, देश क्या करे ऐसे महान राय देने वालों का?

3 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

मैं तो उम्मीद लगाए बैठा था कि आखिर मैं बोर्ड पर सिर्फ " है " ही बचेगा !

सागर नाहर said...

ये शीर्षक इतना बड़ा क्यों रखा है" "बात-बेबात राय देने वालों का क्या करें?" इसे यूं कहते राय़ देने वालों का क्या करें तो भी पता चल जाता।
:)
मजेदार लेख हंसी आ गई।

॥दस्तक॥|
गीतों की महफिल|
तकनीकी दस्तक

Dr.Aditya Kumar said...

बुजुर्ग लोग इसी लिए कहते है ," सुनो सबकी ,करो मन की