10 July 2009

विज्ञापन का ज़माना है, ज़रा देख कर फँसना

आज हम मित्रों के बीच विज्ञापनों को लेकर चर्चा चल रही थी। किस प्रकार के विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं, उनका प्रस्तुतिकरण इस ढंग का हो रहा है कि कई बार अपने आसपास से भी आँखें चुराना पड़ता है।
एक महानगर का हाल बतायें। वहाँ एक नर्सिंग होम के ऊपर बड़ा सा बोर्ड टँगा देखा जिस पर लगा विज्ञापन कुछ इस तरह का संदेश देता दिखा-क्या आप माहवारी से परेशान हैं? आप वाकई गर्भाशय निकलवाना चाहतीं हैं?..... आगे और भी कई लाइन लिखीं थीं जो स्पष्ट रूप से यही साबित करने का प्रयास कर रहीं थीं कि आप (महिलायें) प्रति माह होने वाली माहवारी से परेशान हैं तो अपना गर्भाशय निकलवा लें।
इसके अलावा और भी बहुत से विज्ञापन टी0वी0 और प्रिंट मीडिया के माध्यम से हमारी आँखों के सामने से गुजरते हैं जो सही बात को तो सही सिद्ध करते हैं कई बार गलत बात को भी सही सिद्ध करने का प्रयास करते दिखते हैं।
आपस की चर्चा के दौरान हमने एक पुरानी छोटी सी कहानी सुनाई जो विज्ञापन की सत्यता पर एक अच्छा खासा कमेंट है। हम इसे जितनी बार भी सुनाते हैं उतनी बार ही मजा आता है। आप भी सुन लीजिए इस बार ये कहानी-

मृत्युलोक से मर कर एक आदमी यमराज के सामने उपस्थित हुआ। यमराज ने चित्रगुप्त जी से उसका लेखा-जोखा माँगा तो चित्रगुप्त जी ने बताया कि महाराज आप भूल रहे हैं। अब लोकतन्त्र है, अब आपके हाथ में नहीं है कि किसे स्वर्ग भेजना है और किसे नर्क? अब यह तो आदमी तय करेगा कि उसे जाना कहाँ है? मानवाधिकार का सवाल जो है। चित्रगुप्त जी के ऐसा बताने पर यमराज ने कहा कि ठीक है इस आदमी के ऊपर ही छोड़ दो कि इसे स्वर्ग चाहिए या नर्क?
आदमी से पूछा गया तो उसने कहा कि महाराज हमें एक बार स्वर्ग तथा नरक दोनों जगह दिखा दो। हम देखने के बाद ही फैसला करेंगे कि हमें कहाँ जाना है?
यमराज ने कहा कि ठीक है लोकतन्त्र में सभी की बात सुनी जाती है तो इस आदमी की बात को सुना जाये। उस आदमी को स्वर्ग तथा नर्क दिखाने का इन्तजाम किया गया।
पहले स्वर्ग देखने की इच्छा के कारण उसको स्वर्ग दिखाया गया। उस आदमी ने देखा कि स्वर्ग में अप्सरायें भी हैं, परियाँ भी हैं। कुछ जवान हैं, कुछ वृद्ध हैं। सारे सुख हैं, सुविधायें हैं पर थोड़ी कमी सी है। कारें चल रहीं हैं पर बिना एसी की हैं। बँगले बने हैं पर ठीक से साफ नहीं हैं। हर तरह के ऐशोआराम हैं। इसके बाद भी कुछ न कुछ कमी भी है।
अब आदमी ने नरक की तरफ प्रस्थान किया। देखा कि वहाँ परियाँ, हूरें तो नहीं हैं पर सभी सेवा करने वालीं दासियाँ स्मार्ट हैं, जो नौकर भी काम कर रहे हैं वे बिना किसी आलस के मुस्तैद हैं। इधर भी कारें चल रहीं हैं। बड़े-बड़े भवन बने हैं। लोगों के काम करने में उत्साह है। कहीं भी किसी के साथ मारपीट नहीं की जा रही है। किसी को खौलते कड़ाहे में उबाला नहीं जा रहा है। किसी को आरी से काटा नहीं जा रहा है। कुल मिला कर सभी सुख-सुविधायें दिख रहीं थीं।
आदमी ने बापस आकर यमराज से पूछा सरकार नरक में भी इतनी सुविधायें क्यों? यमराज ने कहा आजकल मानवाधिकार वाले परेशान करने लगे हैं। अल्पसंख्यक आयोग परेशान करता है। राजनेता परेशान करते हैं। सबसे बचने के लिए अब हमने नरक में यातनायें देना बन्द कर दिया है। अब यहाँ भी हमको सुख-सुविधाओं का ध्यान देना होता है।
उस आदमी ने स्वर्ग-नरक की सुविधाओं की आपस में तुलना करके यमराज से कहा कि महाराज हमें नरक में भेज दो। यमराज ने कहा सोच लो फिर न कहना। बापसी का कोई प्रावधान नहीं है। आदमी ने बिना किसी संशय के नरक में जाना स्वीकार किया।
यमरारज के कहने पर उसको नरक में डाल दिया गया। जैसे ही वह नरक के भीतर पहुँचा देखता क्या है जगह-जगह खौलते तेल के कड़ाहे चढ़े हैं, जिनमें आदमी खौल रहे हैं। पापियों को आरी से काटा जा रहा है। किसी को हाथियों से कुचला जा रहा है। हर तरफ चीख पुकार मची है।
यह देख आदमी घबरा गया। उसने चिल्ला कर यमराज को पुकारा और कहा महाराज ये तो हमारे साथ धोखा है। नरक जैसा दिखाया गया था वैसा नहीं है।
यमराज ने कहा कि ये असलियत है, जो तुमको दिखाया गया था वो तो विज्ञापन था। यदि ऐसा न करें तो नरक में आयेगा कौन और स्वर्ग में भी तुम जैसे पापी इकट्ठा हो जायेंगे।।

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मुबारक हो!
बधाई।

Udan Tashtari said...

सही कथा सुनाई मुद्दे पर.

AlbelaKhatri.com said...

bahut achha !

Dr.Aditya Kumar said...

Har chamakti cheej sona nahin hoti.Asliyat samajhne ki kshamta jise prapt ho jaye vah sabhi kunthaon se mukt ho jata hai. Apne sunder vyangaya prastut kiya hai. Badhai.