05 July 2009

समलैंगिक साथी - अब खोजो रिश्तों के नए नाम

अभी सुबह-सुबह एक समाचार पढ़ा कि दिल्ली के एक प्रोफेसर साहब अदालत के समलैंगिकों के समर्थन में दिये गये आदेश से बड़े खुश हैं। अब वे अपने लड़के के लिए किसी लड़की की नहीं बल्कि एक लड़के की ही तलाश करने लगे हैं। उनको अभी तक डर लग रहा था अब वह डर मिट गया है।
समाचार पढ़ा, दिमाग में एक कीड़ा कुलबुलाया। वैसे इस विषय पर तो समूचे देश में गर्मागरम बहस चल रही है इस कारण अभी हम बहस के मूड में नहीं हैं। हम सोच रहे हैं कि समाज में समलैंगिकों के सम्बन्धों को आने वाले समय में सहजता से स्वीकार लिया गया तो हमें बहुत से नये रिश्तों को सम्बोधित करने वाले शब्दों को खोजना होगा।
शब्द निर्माण की प्रक्रिया भी सहजता से चलती रहती है। अब इन सम्बन्धों को लेकर भी नये शब्दों का निर्माण करना होगा। घर के किसी ‘क’ लड़के ने अपने किसी मित्र ‘ख’ लड़के को ही अपना जीवन साथी बनाया तो वह ‘ख’ व्यक्ति उस घर का क्या होगा। बहू या दामाद या कुछ और? (वैसे दामाद का तो सवाल ही नहीं होता क्योंकि वह तो लड़की का पति होता है।) अपने परिचितों को उन घरों के लोग ‘क’ एवं ‘ख’ शख्स को किस रिश्ते के सम्बोधन से मिलवाया करेंगे?
‘क’ लड़के को चाचा, भैया, मामा आदि पुकारने वाले उसके जीवन साथी ‘ख’ शख्स को किस प्रकार सम्बोधित करेंगे?
इसी तरह किसी घर की ‘अ’ बिटिया अपनी महिला मित्र ‘ब’ को अपना जीवन साथी बनाती है तो उसका रिश्ता उसके घर वाले किस रूप में पुकारेंगे? ‘अ’ को मौसी कहने वाले बच्चे ‘ब’ को क्या मौसा कहेंगे? ‘अ’ को बुआ कहने वाले क्या ‘ब’ को फूफा कहेंगे?
रिश्तों को पुकारने की समस्या तो है ही साथ ही दूसरी समस्या एक और आयेगी। वह होगी बहू, दामाद का निर्धारण करने की, ससुराल जाने की, विदाई की।
कोई इसे भले ही पुरातनपंथी कहे पर सत्य यह है कि बेटे की शादी के बाद बहू विदा होकर अपने ससुराल आती है। बिटिया को घर से बारात लेकर आये दामाद के साथ विदा किया जाता है। मान भी लिया जाये कि दोनों नौकरीपेशा हैं फिर भी भले ही एक दिन के लिए ही सही, इस परम्परा का निर्वाह होता है।
अब हमारे दिमाग में समस्या उपजी कि दो लड़को का आपस में जीवन साथी के रूप में स्वीकारे जाने पर कौन सा परिवार किसको विदा करेगा और कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा? यही स्थिति दो लड़कियों को लेकर भी होगी। बहू की मुँह दिखाई, अन्य दूसरी नेग रस्में कैसे निपटाई जायेंगीं? (चलिये रस्मों को लेकर तो सोचा जा सकता है कि हम आधुनिक हो गये हैं, इन्हें छोड़ा भी जा सकता है।)
हम तो समाचार पढ़ कर ही सोच में पड़ गये कि बेचारे प्रोफेसर साहब अपने लड़के के लिए लड़का तो खोजने लगे, माना मिल भी जायेगा पर दूसरे लड़के के घर वाले भी तो लड़का खोज रहे होंगे, ऐसे में कौन बारात लायेगा? कौन विदा करवा कर दूसरे लड़के को अपने घर ले जायेगा?
उफ! हम क्यों बेकार में मगजमारी कर रहे हैं? जिनकी समस्या है वही निपटेंगे। हम सोच रहे हैं कि नये रिश्तों के नये नामकरण के लिए शब्द खोजने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाये। पता नहीं हमारा दिया कौन सा शब्द चलन में आ जाये और हम भी प्रसिद्ध हो जायें।
कोई कुछ भी कहे, समलैंगिक सम्बन्धों की वकालत उन सभी लोगों को अनिवार्य रूप से करनी चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण और कन्या भ्रूण हत्या निवारण के लिए काम कर रहे हैं। इस नये सम्बन्ध से जनसंख्या रुकेगी और बच्चे ही नहीं होंगे तो कन्या भ्रूण हत्या होने का सवाल ही नहीं। हाँ, दहेज की समस्या और दहेज के लिए प्रताड़ना के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता और महिला हिंसा...........पता नहीं?
चलिए इसमें कुछ तो अच्छा है.........। जय हो.........

5 comments:

veerubhai said...

As of now this is a far fetched idea. Religious group are out with FATVAS.IT is beginning of a long drawn fight for LGBT SAMAJ(GAYS0.Lingua fona will also be settled ."JAT MARA JAB JAANIYO JAB TIJAA HO JAAYE"virendra sharma,43309,silverwood Drive,Canton,MI,USA

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत खूब....।
नये रिश्तों के बारे में हमे भी अवगत कराना।

Dr.Aditya Kumar said...

samlengikta par charcha karte samaya hame yah dhyan rakhana chahaye ki Adalat ne vivah ya natural system kake vikalp ke roop me samlengikta ko pesh nahin kiyahai.prayah ye sambandh vivah na ho paane ki athva parivar se door hone ki paristhitiyon me ban jate hai.is faisle ko vyaktigat swatantrata ke pariprekshya me dekha jana chahiye.

दर्पण साह "दर्शन" said...

ye dosti hum nahi choren GAY...

choren GAY dum mahar...

..tera saath na choren GAY

RAJIV MAHESHWARI said...

आपकी साधना पूरी हो- शुभकामनाएं॥