27 April 2009

राजनेता और मतदाता के बीच लोकतंत्र

राजनीति का पहला सबक या कहें कि लोकतन्त्र की पहली परिभाषा यह कि ‘‘जनता का शासन, जनता के लिए, जनता के द्वारा’’ का कोई सैद्धान्तिक प्रभाव नहीं रह गया है। हो सकता है कि बहुत से राजनैतिक विश्लेषकों को, राजनैतिक जानकारों को, प्राध्यापकों को हमारी यह बात न जँचे पर सत्यता तो यही है। आज जिस प्रकार से सत्ता के लिए आपसी चाल और नीतियों का खेल खेला जा रहा है उसको देखकर तो लगता ही नहीं है कि जनता का शासन वाकई जनता के लिए है।
यदि इसे किसी पूर्वाग्रह के रूप में न देखा जाये तो क्या कोई भी इस बात से इनकार करेगा कि वर्तमान में चल रही लोकसभा के लिए जब विगत चुनावों में जनता ने अपने मत का प्रयोग किया था तो उसके सामने वर्तमान प्रधानमंत्री जी का स्वरूप था? शायद ही किसी ने सोचा होगा कि माननीय मनमोहन सिंह जी इस देश के प्रधानमंत्री बनकर सामने आने वाले हैं? लोकसभा का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति लोकसभा का पूरे पाँच वर्ष तक सदस्य ही नहीं रहा, क्या यह लोकतन्त्र का मजाक नहीं? इसी प्रकार से विगत वर्ष में चले एक राजनैतिक ड्रामे को तो कोई भी अभी तक नहीं भूला होगा, जबकि देश की एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के समर्थन से एक निर्दलीय को मुख्यमंत्री बनना नसीब हो गया था। क्या ऐसा हमारे संविधान निर्माताओं ने सोचा होगा कि कभी इस लोकतांत्रिक देश में ऐसा भी दिन आयेगा?
वास्तव में इस देश में लोकतन्त्र यहीं तक सीमित है। जनता के सामने मशीन रहती है, पल भर को उसके सामने किसी को भी बनाने, किसी को भी बिगाड़ने की शक्ति होती है। मतदान किया और लोकतन्त्र समाप्त। यह हास्यास्पद लगता है पर सत्यता यही है। इस देश की जनता के सामने लोकतन्त्र चुनाव के समय आता है और वह भी मात्र दो-तीन पल को। इस प्रकार के लोकतन्त्र के साथ जनता कैसे सोचे कि उसका शासन, उसके लिए, उसके द्वारा चलाया जा रहा है?
मतदाता की तरह से राजनेता विचार नहीं करते हैं। यदि विचार करते होते तो किसी को अपने खानदान का नाम, किसी को अपने विगत को बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस बार तो बहुत आम रूप में देखने में आया है कि मुद्दों के स्थान पर नामों के साथ चुनाव लड़ा जा रहा है। कोई किसी को इस परिवार का तो कोई किसी को दूसरे परिवार का बता रहा है। किसी के सामने दलित वोट बैंक के रूप में स्थापित है तो कोई मुसलमानों को अपने वोट बैंक के रूप में देखना पसंद कर रहा है। विकास के नाम पर तो किसी की लड़ाई नहीं लड़ी जा रही है तो कोई न कोई बात तो ऐसी चाहिए जो जनता के मतों को उस दल के लिए परिवर्तित कर दे। जब कुछ नहीं बन सका तो प्रधानमंत्री की दौड़ शुरू हो गई है। इससे विद्रूप स्थिति शायद भारतीय राजनैतिक इतिहास मे कभी ही रही हो जबकि नेताओं को स्वयं अपने आपको प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना पड़ रहा हो। यह भी राजनैतिक पतन की पहचान है, अस्तित्व संकट की पहचान है। ऐसी स्थिति में जबकि न तो मतदाता के सामने और न ही राजनेता के सामने कोई रास्ता है तब लोकतन्त्र के जीवित रहने के प्रमाण जुटा पाना भी मुश्किल प्रतीत होता है। आज किसी राजनेता के नाम पर, स्वयं को दलित का मसीहा बता कर, धर्म के नाम पर अपने आपको प्रतिस्थापित कर, धर्मनिरपेक्ष का मुखौटा धारण कर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया जा रहा मतदाता और राजनेता के मध्य लोकतन्त्र कहीं पिस कर दम ही न तोड़ दे?

3 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सही है. अब जो जूते चल रहे हैं, उनकी चाहे कोई कितना भी निन्दा कर ले, पर वे हैं ऐसे ही क्षोभ के नतीजे. पूरा देश राजनीति के मामले में विकल्पहीनता का शिकार लग रहा है. मनमोहन ही क्यों, क्या कभी सोचा जा सकता था कि कलाम के बाद प्रतिभा जैसी शख्स इस देश की राष्ट्रपति होगी? लोकतंत्र का यहीं हो सकता है और इसीलिए प्रधानमंत्री रहते किसी व्यक्ति पर जूता भी यहीं चल सकता है.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सभी दलों में राजतंत्र या कुलीन तंत्र कायम है। जब तक दलों में जंनतंत्र न होगा। उन के खर्चे विशुद्ध सदस्यता शुल्क पर न चलने लगेंगे तब तक जनतंत्र भी राजतंत्र और कुलीन तंत्र बना रहेगा।

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

vartman vyastha ke tahat me diya kintu yh kisee prash ma uttar naheen hai.mainne kuchh maulik chitan kar samadhan sudhye hain yh jante hue bhee koee dl ise hona naheen dega...