13 April 2009

हर बच्चे के मुंह में चाँदी की चम्मच क्यों नहीं होती?

‘चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना’ बचपन में इस वाक्य को जब भी पढ़ते थे तो सोचा करते थे कि एक बच्चा कैसे इतनी बड़ी चम्मच लेकर पैदा होता होगा? हालांकि उस समय तो बच्चों के पैदा होने की प्रक्रिया ही हम लोगों की समझ से परे थी, कोई आज के बच्चे तो थे नहीं कि सब कुछ टी0वी0 पर, इंटरनेट पर दिखता हो। धीरे-धीरे अक्ल आई और उक्त वाक्य का सही अर्थ समझा। उस छुटपन में भी पिताजी के साथ, कभी अपने बाबाजी के साथ साइकिल पर बैठ कर स्कूल जाते हुए शहर में शान बघारतीं एक दो मोटरगाड़ियों को देखकर, कुछेक स्कूटरों को फरफराते देखकर लालच सा आता।
घर आकर अम्माजी से पूछते कि क्या हम लोग कार नहीं ले सकते? उन्हीं दिनों एक बड़ी ही रोचक घटना हुई जिसको लेकर आज तक परिवार में सभी हँसी-मजाक कर लेते हैं। हमारे मकान मालिक बहुत बुजुर्ग थे और उनके कोई सन्तान भी नहीं थी। सम्पन्नता के साथ-साथ उनको कंजूसी भी काफी सम्पन्नता में प्राप्त हुई थी। उनके पास उस समय एम्बेसडर कार थी, पूरे मुहल्ले में इकलौती कार।
वह कार हम बच्चों के लिए बड़ी ही कौतूहल की बस्तु थी। अपने दोस्तों के साथ स्कूल में इसी बात पर रोब झाड़ लिया करते थे कि हमारे वकील बाबा के पास कार है। (उन मकान मालिक को जोकि एडवोकेट थे, बुजुर्ग होने के कारण हम बच्चे बाबा कहते थे) पता नहीं अपनी वृद्धावस्था के कारण, कंजूसी के कारण या फिर किसी पर भी विश्वास न करने के कारण जब उनको लगने लगा कि अब कार चलाना उनकी अवस्था के अनुरूप नहीं रहा तो उन्होंने उस कार को बेच दिया। (बाबा अपनी कार स्वयं ही चलाते थे कभी कोई ड्राइवर नहीं रखा) कार बेच कर एक साइकिल खरीद ली।
घर में, मुहल्ले में बड़ी ही चर्चा हुई कि चचा को कंजूसी बहुत चढ़ी है........वृद्ध हो रहे हैं ऐसे में साइकिल चलायेंगे.....अरे! एक ड्राइवर ही रख लेते.......पैसे की कौन सी कमी है....आदि-आदि। हम छोटी बुद्धि के बालक कुछ समझ में तो आता नहीं था। रुपये-पैसे का भी मोल नहीं मालूम था। एक दिन अपनी अम्मा से कहा जैसे वकील बाबा ने अपनी कार बेचकर साइकिल खरीद ली है क्या वैसे पिताजी अपनी साइकिल बेचकर कार नहीं खरीद सकते? अम्मा हँस दीं और प्यार से सिर पर हाथ फेरकर बोलीं अब तुम ही कार खरीदना और हम दोनों को घुमाना।
हम तो भौचक्के से रह गये थे कि जो सवाल हमने पूछा अम्मा ने उसका उत्तर तो दिया नहीं हमारे सिर पर एक काम और बता दिया। अम्मा की बात हमारे दिमाग में घूमती रही, आज भी घूमती है। आज भी कार न ले सके, उन दोनों को न घुमा सके। बहरहाल............
समाज के कुछ लोगों को आज देखते हैं तो पता चलता है कि चाँदी की चम्मच मुँह में लेकर पैदा होना किसे कहा जाता है। एक तरफ युवा वर्ग है जो अपनी बेकारी से, घर-परिवार के भरण-पोषण की समस्या से जूझ रहा है और एक तरफ वो युवा वर्ग है जो अपने मुँह में चाँदी का चम्मच लेकर घूम रहा है।
एक तरफ ऐसे युवा हैं जो अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए किसी का वरदहस्त चाहते हैं और दूसरी ओर ऐसा युवा वर्ग है जिसकी चाटुकारिता में बड़े-बड़े अपने को धन्य समझ रहे हैं। देश के सर्वोच्च पद के लिए एक युवा का नाम उसकी काबिलियत के कारण नहीं मुँह में दबी चाँदी की चम्मच के कारण आ रहा है।
क्या देश का हर बच्चा चाँदी की चम्मच मुँह में दबाकर पैदा नहीं हो सकता है?

चुनावी चकल्लस-

ये राजनीति का फंडा है कुछ भी करे जा,
बिना शर्म संकोच गधे को बाप कहे जा,
राजनीति में चाटुकारिता का अपना महत्व है,
दौड़ है पद की बस चाटुकारिता किये जा।

2 comments:

Mired Mirage said...

बात चांदी के चम्मच तक ही सीमित रह्ती तो कोई बात नहीं थी किन्तु यहाँ तो बच्चे राजनीति का चम्मच ही नही राजनेता का और प्रधानमन्त्री तक का चम्मच मुँह में लेकर पैदा होते हैं ।
घुघूती बासूती

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

चांदी की चम्मच सबको ही मिल जाती तो कहना ही क्या.. बहुत अच्छा कटाक्ष.. आभार