12 April 2009

समाज हित में सकारात्मक स्वीकार्य निष्कर्ष चाहिए

एक बात हम आज तक नहीं समझ सके हैं कि जब भी स्त्री-पुरुष की चर्चा होती है तो वह चर्चा कपड़ों, अश्लीलता, मानसिकता पर आकर क्यों टिक जाती है? आज के समय में क्या स्त्री को मात्र एक देह की तरह ही स्वीकारा जाना चाहिए? क्या स्त्री-पुरुष के आपसी सम्बन्धों को केवल शरीर के आधार पर ही तय करने चाहिए? स्त्री सशक्तिकरण के नाम पर क्या स्त्रियों का रात को घूमना, कपड़ों का कम पहनना ही आता है?
यहाँ कोई कारण विवाद पैदा करना नहीं है किन्तु जब भी किसी बात की शुरुआत हो और उसका अन्त सकारात्मक या फिर किसी सहज स्वीकार्य निष्कर्ष पूर्ण न हो तो उस विवाद का कोई भी अर्थ नहीं। आजकल देखा जा रहा है कि समाज में स्त्री-पुरुष के नाम पर विवाद तो होता है, बहस भी चलती है पर किसी तरह का स्वीकार्य निष्कर्ष प्राप्त नहीं होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम ही किसी निष्कर्ष को प्राप्त ही नहीं करना चाहते हैं?
यदि देखा जाये तो पुरुष अहम्, पुरुष प्रधानता के साथ-साथ आज आत्माभिमान भी इस विवाद के पीछे दिखाई देता है। घर में भी देखने में आया है कि पति-पत्नी में आपस में स्वाभिमान की लड़ाई चलती है। स्त्री जागरूकता ने महिलाओं को एक मंजिल प्रदान की है तो उसके सामने विवाद के रास्ते भी खोले हैं। इसके साथ ही प्रगति करती महिलाओं को पीछे करने में कुछ महिलाओं का भी योगदान रहता है। इस वाक्य को अन्यथा न लेकर एक पल को अपने आसपास घटती घटनाओं पर भी गौर कर लें तो पता चलेगा कि क्या सत्यता है?
किसी महिला की मदद से एक नादान बच्ची को देह व्यापार के बाजार में धकेल दिया जाता है। काल-गर्ल रैकेट का धंधा कराने के पीछे, संचालन के पीछे यदि पुरुष का दिमाग काम करता है तो एक महिला भी उसी क्षमता से भूमिका का निर्वाह करती है। कई बार खबरें पढ़ने में आतीं हैं कि आपसी रंजिश के चलते एक महिला की मदद से दूसरी महिला के साथ बलात्कार किया गया। आये दिन ऐसी खबरों का प्रकाशन होता है। इन सभी खबरों के पीछे पुरुष मानसिकता हावी नहीं रहती होगी?
एक बात और वह यह कि अक्सर देखा गया है कि किसी भी दहेज प्रताड़ना के केस में सीधे-सीधे पुरुष को दोषी करार दे दिया जाता है। क्या यह एकदम तथ्यपूर्ण है कि महिला हिंसा की सभी घटनाओं में दहेज का ही दानव काम कर रहा है? एक महिला यदि किसी दुर्घटनावश मृत्यु का शिकार हो जाती है तो क्या वह सिर्फ दहेज के दानव का ही शिकार बनती है? हर मामले में ऐसा नहीं होता है परन्तु अधिकतर मामलों में पूरे परिवार को दहेज प्रताड़ना के नाम पर हवालात की, जेल तक की हवा खानी पड़ जाती है।
इस प्रकार के संदर्भ समाज मंे आपस में तनाव ही पैदा करते हैं। आज यदि गौर किया गया हो तो आपने देखा होगा कि बस में, ट्रेन में अब महिलाओं के प्रति लोगों का नजरिया बदलता सा जा रहा है। एक महिला खड़ी रहती है और कोई पुरुष सवारी उसको जगह देने जैसी सहृदयता नहीं दिखाता है। क्या हम स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर इस प्रकार का विभेद भरा समाज चाहते हैं? इसके ठीक उलट यदि कोई सहृदय पुरुष सवारी किसी खड़ी हुई महिला को जगह देने का जोखिम उठाता भी है तो उसे उस महिला से खरी खोटी सुनने को तैयार रहना पड़ता है। क्या अब समाज में स्त्री की मदद करना उसे पुरुष के अधीन बनाना ही है? समझ नहीं आता है कि आखिर हम स्वाधीनता के नाम पर, स्वतन्त्रता के नाम पर, सशक्तीकरण के नाम पर किस प्रकार का समाज बनाना चाह रहे हैं? यह बात पुरुषों और स्त्रियों (दोनों) पर लागू होती है।
सोचिए कि स्त्री पुरुष के आपसी सम्बन्धों पर चलती बहस क्या बस बहस ही बनी रहेगी या फिर उसमें किसी तरह के सकारात्मक परिणाम आने की गुंजाइश है? पुरुष के साथ-साथ आज स्त्री भी इस सवाल के लिए जिम्मेवार है क्योंकि अब वह भी आजाद है, स्वतन्त्र है, जागरूक है, सशक्त है।

चुनावी चकल्लस-

चुनाव आयोग की पहल का असर दिखता है,
न बैनर, न पोस्टर, न शोरगुल दिखता है,
कैसे अपने वोटर को प्रभावित करें,
नेता इसी में बहुत परेशान सा दिखता है,
नहीं मतदाता के विकास की उसे फिक्र है,
वह तो विरोधी के विनाश में तत्पर दिखता है।

2 comments:

रचना said...

purush kae paas jo kush sadiyon sae thaa stri kae paas bahut mehnat aur saamjik viorodh seh kar aayaa haen so undono ko comapre karna hi galat haen .

purush ko samaj jaesa haen waesa swikartaa haen , stri ko samaj tab swikartaa haen jab jaesa smaaj chahey waesi wo ho

so samay deejiyae stri ko ki wo jo usae aaj mila haen usko " enjoy" kara sakae yaani apni uplabdhiyon ko saamny rup sae lae sakae

jis din stri kaa kamana , naari sashktikaran ek behas kaa mudaa nahin hoga usdin samataa hogee

aap khud hi bataaye naari sashktikaran ki jarurat kyuon hui ?? purush sashktikaran ki jarurat kyun nahin hui ??

garam ubale dudh ko peenay ki koshish karnae sae aap khud hi jaltaey haen so agar stri khud sae kuchh sikhana chahtee haen to seekhane dae

kam sae kam khud jalaegi koi aur to nahin jalaayaega

Anonymous said...

Nice post and this fill someone in on helped me alot in my college assignement. Gratefulness you on your information.