26 March 2009

जनता अपना कलेजा देने को विवश है

दोस्तों का आना और जाना लगा हुआ है। आज की दोस्ती कल दुश्मनी में बदलती दिख रही है। कोई कह रहा है कि वे हमारे साथ हैं तों कोई कह रहा है कि हमें फलां का साथ है। देखने वाले परेशान हैं कि दोस्ती का आंकड़ा किस तरह समझें पर दिखाने वालों को कोई परेशानी नहीं है।
यह सब चुनावी मौसम के मस्ताने हैं जो अपने-अपने यार-दोस्तों को तलाशने में और दूसरे के दोस्तों को भगाने में लगे हैं। यह हमारे देश का लोकतन्त्र है जहाँ इस समय सब काम सत्ता के लिए चल रहे हैं। दलों का अपना फंडा है कि किस तरह से किसके साथ निभेगी। निभाने की समस्या सिर्फ चुनावों तक के लिए है, इसके बाद तो जनता को निभानी है।
बहुत पहले (छोटे में) एक कहानी पढ़ी थी - बंदर और मगरमच्छ की, जिसके अनुसार मगरमच्छ ने अपनी पत्नी के लिए बंदर का कलेजा मांगा (दोस्ती की आड़ में) और बंदर ने खुद को चालाकी से बचा लिया। बंदर तो बच गया पर उन दोनों की दोस्ती तो सदा के लिए समाप्त हो गई।
आजकल जनता से उसका कलेजा मांगा जाता है। जनता बचने की कोशिश भी करती है पर बच नहीं पाती है क्योंकि इसे नहीं तो उसे अपना कलेजा देना ही है। ऐसे में उसको कोई उपाय भी नहीं सूझता है कि वह क्या करे?
चलो कलेजे को तैयार करो क्योंकि ये नहीं तो कोई दूसरा मगरमच्छ कलेजा खाने को तैयार बैठा है।
चुनावी चकल्लस-

गलबहियों के दौर हैं, बजे मिलन के गीत,
इनसे रिश्ता, उनसे नाता, बता रहे हैं मीत।
ढूँढ़ रहे हैं दल-दल में, एक कुर्सी का साथ,
कुर्सी पाते ही बोलेंगे, कैसा रिश्ता, कैसा मीत?

2 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अजी जनता के कलेजे का भी क्या है! वो तो वो ख़ुद हथेली पे लिए घूमती है लुच्चे लफंगों के लिए.

रंजना said...

sahi kaha.janta ke paas apna kaleja bachane ka koi upaay nahi....

sare hi to baithe hain,cheen jhapatkar kha jane ke liye