21 March 2009

हिन्दी भाषा की चीर-फाड़ न करें.....

इस समय हिन्दी दिवस या फिर हिन्दी से सम्बन्धित कोई भी सप्ताह, पखवाड़ा, माह आदि भी नहीं मनाया जा रहा है फिर भी हम हिन्दी की बात करने आ गये हैं। दरअसल देखने में आ रहा है कि विगत कुछ वर्षों से हिन्दी को लेकर हिन्दी भाषियों और अहिन्दी भाषियों के द्वारा हिन्दी विकास के लिए बड़े-बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार, बड़े-बड़े कार्य किये जाते रहे हैं। इन्हीं कार्यों और इनके प्रयासों से जो लोग जागरूक हुए हैं वे तो सही रूप में कार्य कर रहे हैं और जो बस ये दिखाने के लिए कि वे भी हिन्दी विकास हेतु कार्य कर रहे हैं, हिन्दी की टाँग तोड़ने का काम कर रहे हैं।
आपने देखा होगा कि इस समय हिन्दी भाषा में कार्य करने वाला व्यक्ति (जो हिन्दी में पढ़ा रहा है या जो ये साबित करना चाहता है कि वो सच्चा हिन्दी सेवी है) अपने कार्यों के दौरान अंग्रेजी के कुछ शब्दों को भी हिन्दी में अपने अनुसार अनुवाद करके उनका प्रयोग कर रहा है। यही अतिप्रेम की निशानी हिन्दी को लाभ पहुँचाने के स्थान पर हानि पहुँचा रही है।
इस समय हिन्दी की पत्रिकाओं और हिन्दी के पत्रों पर गौर करिए, हिन्दी सेवी का अहम् पाले लोगों का काम देखिए वे मोबाइल के स्थान पर विविध शब्दों का प्रयोग करने में लगे हैं। आखिर मोबाइल इस समय जन-जन की पहुँच में है और हिन्दी सेवी या फिर हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएँ होने के कारण सम्पर्क में मोबाइल लिख कर अंग्रेजी कैसे लिख दें? इसका निवारण करते हुए इन महामना लोगों ने मोबाइल को ‘चलितवार्ता’, ‘चलभाष’, ‘दूरध्वनि’, ‘चलध्वनि’ का नाम देकर स्थापित करना शुरू कर दिया है।
अच्छा है कि अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी का प्रयोग हो पर यह तो नहीं कि जिसका जो मन हुआ वही लिखने लगे। क्या वास्तव में मोबाइल के हिन्दी अर्थ यही सब होंगे? एक मिनट को विचार करें कि क्या इन शब्दों का हिन्दी में अनुवाद किया जाये तो क्या इनका अर्थ मोबाइल ही निकलेगा?
इसी तरह से हिन्दी की छीछालेदर करने में हमारे हास्य व्यंग्य के कविगणों का विशेष हाथ भी रहा है। कविता में हास्य का पुट पैदा करना है तो हिन्दी को अतिक्लिष्ट रूप में प्रस्तुत कर दो, हास्य उत्पन्न हो जायेगा। इन कविताओं में, हास्य का पुट देने के लिए साइकिल को ‘द्विचक्रवाहिनी’, ट्रेन को ‘लौहपथगामिनी’ के नाम से परिभाषित किया जाता है। क्या वास्तव में इन दोनों शब्दों के यही हिन्दी अनुवाद होंगे? (ऐसे बहुत से शब्द हैं जो अंगेरजी के हैं और उनका हिन्दी रूपान्तरण हास्य के लिए क्लिष्ट रूप में किया जाता है।)
हिन्दी की मानक शब्दावली का निर्माण करने के लिए हमारे देश में एक आयोग कार्य कर रहा है। आयोग का कार्य सराहनीय है किन्तु इसके बाद भी उसमें अनेक प्रकार की खामियाँ हैं जो हिन्दी की स्थिति को गिरावट का शिकार बना दे रहीं हैं। इसके पीछे आयोग की मंशा ये कदापि नहीं है कि हिन्दी का विकास न हो पर कम से कम उस आयोग को जो हिन्दी की मानक शब्दावली का निर्माण कर रहा हो उसे तो इसका ध्यान रखना ही होगा। हिन्दी को मानक रूप देने की अतिशय जल्दबाजी में हिन्दी की मात्राओं के साथ तथा पंचम वर्ण के साथ व्यापक रूप से खिलवाड़ किया जा रहा है। निःसंदेह इससे हिन्दी भाषा की व्यापक शब्दावली बने या न बने पर कुछ शब्दों का लोप अवश्य ही हो जायेगा।
आयोग ने मानक रूप के लिए पंचम वर्ण के प्रयोग में छूट की है इससे आम बोलचाल की भाषा में कहें तो आधे अक्षर के प्रयोग में आसानी हो गयी है। अब सम्पादक को आप ‘संपादक’ लिख सकते हैं, दयानन्द को आप ‘दयानंद’ लिख सकते हैं। इससे आसानी भले ही हुई हो पर यदि गौर किया जाये तो ज्ञात होगा कि हम आधे म को धीरे-धीरे भुला देंगे, जैसे कि हमने पंचम वर्ण ‘ञ’ को भुला दिया है। क्या आप लोग अब ‘ञ’ का प्रयोग करते हैं?
हिन्दी भाषा के विकास का दौर चल रहा है या नहीं ये तो नीति-नियंता ही जानते होगे पर ये तो तय बात है कि अंगेजी को देखकर हिन्दी अनुवाद से हिन्दी का विकास नहीं होगा। सिर्फ हिन्दी में शब्दों के बोलने के लिए अंगेजी शब्दों का हिन्दी अनुवाद सही नहीं है। यदि किया ही जाये तो इसको व्यंग्य रूप में नहीं सहज स्वीकार्य रूप में प्रयोग किया जाये। हिन्दी भाषा का सरलीकरण किया जाये, सहजीकरण किया जाये ताकि हिन्दी वाकई जन-जन की भाषा बन सके। कवि सम्मेलनों या हँसी, चुटकुलों के लिए प्रयोग न हो सके। क्या किसी ग्रामीण या शहरी ने ‘लालटेन’ का कोई हिन्दी अनुवाद खोजने की कोशिश की है?
वैसे एक सवाल हमारा ब्लाग के पुरोधाओं से (मात्र जिज्ञासा शमन के लिए) ‘ब्लाग’ का हिन्दी रूपान्तरण या अनुवाद ‘चिट्ठा’ किस आधार पर किया गया है?

2 comments:

युग-विमर्श said...

प्रिय डॉ. कुमारेन्द्र सिंह,
आपके विचार पढ़े. बात केवल टीका-टिप्पणी या दुःख व्यक्त करने की नहीं है. विचारणीय यह है कि हम क्या वास्तव में हिंदी के हितैषी हैं ? ब्रज भाषा को कोई सरकारी प्रोत्साहन नहीं मिला, फिरभी वह सम्पूर्ण देश की साहित्यिक भाषा थी. कोई भी फ़ारसी भाषा का कवि ऐसा नहीं था जिसने ब्रज में दो-एक छंद पद्य-बद्ध करना अपने लिए गौरव का विषय न समझा हो. इस प्रसंग में उत्तर दक्षिण जैसा कोई विभाजन नहीं था.ब्रजभाषी और अब्रजभाषी जैसी कोई लकीर भी नहीं थी. हिन्दू मुसलमान जैसा साम्प्रदायिक आधार भी नहीं था. फ़ारसी परंपरा के साहित्यकार इसे 'हिन्दवी' कहते थे और नस्तालीक़ लिपि में लिखते थे देशज परंपरा में यह 'भाखा' कहलाती थी और देवनागरी में लिखी जाती थी. सभी साहित्यकार दोनों लिपियों से परिचित थे. कम-से-कम देवनागरी आन्दोलन से पूर्व यानी 1861 से पहले ऐसा ही था. अरबी, फ़ारसी या तुर्की शब्दावली से इसे कोई परहेज़ नहीं था. हाँ उसे अपने स्वभावानुकोल बनाने की इसमें क्षमता थी. फीरोज़ा को इसने पीरोजा, फ़तीला को पलीता, जमा'अत को जमात, मस्जिद को मसीत, नायिब को नेब,अमारी को अम्बारी,दुहल को ढोल बना लेना उनके लिए सहज था.संस्कृत के शब्दों के साथ भी हिन्दवी [भाखा] का यही व्यवहार था. सुविधा को सुभीता, यमुना को जमुना, मनुष्य को मानुस, और इसी प्रकार ढेर सारे शब्द दिए जा सकते हैं. यह पद्धति विशुद्ध भारतीय थी. कर्ण-कटु ध्वनियों जैसे 'ण' को स्थायी रूप से 'न' में बदल दिया गया. जीवित भाषायें यही करती भी हैं. उर्दू ने ब्रज की इसी विरासत का लाभ उठाया. लैंटर्न को लालटैन, हास्पीटल को अस्पताल, एकेडेमी को अकादमी इसी आधार पर बनाया गया. देवनागरी आन्दोलन जो आगे चलकर हिंदी आन्दोलन कहलाया मूल रूप से अलगाव-वादी और शुद्धतावादी था. उसने आधार- भाषा के रूप में उर्दू का ढांचा ज़रूर लिया किन्तु संस्कृत के प्रति प्रेमातिरेक के कारण शुद्धतावादी रुख अख्तियार किया. ब्रज की विरासत के बजाय संस्कृत की विरासत को चुना. 'ण' की ध्वनि को पुनर्जीवित किया. जमुना को फिर से यमुना बना दिया. प्राचीन ग्रंथों के नाम तक शुद्ध कर दिए. संनेह रासउ को संदेशरासक, पउम् चरिउ को पद्म-चरित कर देने में उसे संकोच नहीं हुआ. हिंदी को हिन्दुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहा, हिंदी भाषी और अहिन्दी-भाषी का विभाजन किया. हिंदी-प्रदेश और अहिन्दी प्रदेश घोषित किये. हिंदी जाति की काल्पनिक नींव रखने का प्रयास किया. प्रश्न महत्वपूर्ण यह है की इस अलगाववादी और शुद्धतावादी दृष्टिकोण से भाषा का कितना विकास संभव है. ?
शैलेश ज़ैदी

अनुनाद सिंह said...

कुमारेन्द्र जी,

आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे को फिर छेडा है।

आपने जिसको/तिसको हिन्दी का अहित करते हुए बताया है। हिन्दी को सरल करने की बात कही है (जैसे दुनिया में हिन्दी ही क्लिष्टता की पर्याय है) कभी चीनी भाषा और उसकी लिपि की क्लिष्टता की बात आपने सुनी है? जर्मन भाषा की क्लिष्टता के बारे में कभी विचार किया है? फिर भी ये भाषाएं अपने देशों में धड़ल्ले से चल रहीं हैं। इन देशों के वैज्ञानिक और तकनीकी कार्य ब्रितानियों से बहुत आगे हैं।

हिन्दी भाषा न कठिन है न इसको किसी सरलीकरण की दरकार है। क्या इस देश में हर आदमी अंग्रेजी इसलिये रट रहा है कि वह सरल है? जी नहीं। सबको पता है कि अंग्रेजी एक कठिन भाषा है - व्याकरण की दृष्टि से, उच्चारण की दृष्टि से, वर्तनी की दृष्टि से, भारी-भरकम शब्दकोश की दृष्टि से।

हिन्दी का अहित कतईं इस कारण नहीं हो रहा है कि कोई "मोबाइल" को "चलभाष" कहने की कोशिश कर रहा है। इसका असली अहित इस कारण हो रहा है कि रोजगार के लिये इसकी अनिवार्यता समाप्त है; इसकी उपेक्षा का किसी को कोई खामियाजा नहीं भुगतना पड़ता। अंग्रेजी को अघोषित रूप से हर रोजगार के लिये अनिवार्य घोषित कर दिया गया है - यही एक मात्र समस्या है, और कुछ भी नहीं।

सारांश यह है कि आपके इस लेख ने वास्तविक मुद्दे को ताख पर रखकर अर्थहीन मुद्दों को बहुत महत्वपूर्ण मान लिया है।