15 February 2009

पहले वेलेण्टाइन डे फिर बाल दिवस

कल वेलेण्टाइन डे मना लिया गया, कुछ लोगों ने मनाया कुछ लोगों ने मनाने नहीं दिया और कुछ लोगों ने कुछ लोगों को मनवा दिया। सब लोग अपनी-अपनी तरह से संतुष्ट हुए। इस संतुष्टि-असंतुष्टि के खेल में एक बात तो साफ हो गई कि जिसे जो करना है वह करके ही रहता है चाहे जो हो जाये। चलिए एक पल को मान लिया जाये कि एक दिन प्यार-प्रेम के नाम होना चाहिए तो क्या ये आवश्यक है कि उसको किसी तरह का ढिंढोरा पीट कर ही मनाया जाये? इसके उलट यदि यह मान लिया जाये कि इस तरह के दिवस किसी तरह से भी भारतीय संस्कृति को खतरा पहुँचा रहे हैं तो क्या इस तरह ही मारपीट से भारतीय संस्कृति में विकास की सम्भावनायें दिखायी देने लगेंगीं?
सवाल यहाँ सभी के अपने आप से होने चाहिए कि वे जो भी कर रहे हैं क्या वो सही है? इस बात से किसी को इन्कार नहीं होगा कि आज के समय में रिश्तों में जिस तरह से गिरावट आयी है, रिश्तों की गरिमा का जिस तरह से खून हुआ है उससे लगता नहीं है कि आपस में (युवा वर्ग में जो इस दिन के नाम पर प्यार की चाह लिए भटकता रहता है) सिवाय शारीरिक आकर्षण के कुछ भी होता होगा। जिन युगलों में आपस में विश्वासपरक प्यार है, कसमें खाने से ऊपर का प्रेम है वे निश्चय ही इस दिन की गरिमा को समझते होंगे और अपने प्यार के प्रदर्शन को सादगी भरा बनाते होंगे।
शारीरिक आकर्षण सभी में होता हो यह आवश्यक नहीं पर इसकी सम्भावना अधिक होती है। इस शारीरिक आकर्षण के पीछे छिपी वासना को, लालसा को यदि तृप्ति नहीं मिलती है तो उसके विस्फोटक होने की सम्भावना अधिक हो जाती है। यदि एक पल को वेलेण्टाइन डे के उन्माद से बाहर निकल कर देखा जाये तो पता चलेगा कि कल जब सभी लोग इस दिन की खुमारी में डूबे थे तब कुछ परिवार अपने बच्चों के कातिल को सजा होते देखने का सुख (बच्चों को खोने के बाद कैसा सुख होगा ये तो वो ही जाने) महसूस करना चाहते थे। यकीनन यहाँ निठारी हत्याकांड की चर्चा हो रही है। दोनों को सजा मिली पर अभी पूरी तरह सुकून नहीं क्योंकि उनके अभी उच्च न्यायालय तक जाने और उससे भी ऊपर जाने के रास्ते खुले हैं।
यहाँ निठारी कांड के दोषियों का जिक्र इस मायने में महत्वपूर्ण लगता है क्यांकि ये कांड भी अतृप्त वासना के पीछे से उत्पन्न हुआ था। शरीर की मांग इतनी अधिक रही और उसकी पूर्ति उसकी पत्नी से पूर्णतः नहीं हो सकी परिणामतः बच्चों को हवस का शिकार बनाया जाने लगा। इस घटना का वेलेण्टाइन डे से किसी भी तरह का लेना-देना नहीं किन्तु इसको इससे अलग करके भी नहीं देखा जाना चाहिए।
प्यार कर चाह में भटकते युवाओं में सभी को इस दिन अपना साथी नहीं मिल जाता और वे किसी न किसी रूप में अपने प्यार को पाने का रास्ता खोजते हैं। असफलता किसी न किसी लड़की के चेहरे को बिगाड़ कर, किसी न किसी लड़की से बलात्कार कर, किसी न किसी लड़की की हत्या कर अपने आप को सफल सिद्ध करने का प्रयास करती है।
बहरहाल जिस समाज में आज भी लड़की और लड़के में भेद किया जाता हो वहाँ कैसे सम्भव है कि लड़की को उसके इन्कार की सजा न मिले। जिसे प्रेम का इजहार करना है वे पूरे साल एक इसी दिन का इन्तजार करें, यदि सफल हो गये तो कभी भी पूर्ति की जा सकती है और यदि असफलता हाथ लगती है तो किसी न किसी रूप में अपराध को ही बल मिलता है। हमारा मानना है कि अपराध (विशेष रूप से लड़कियों पर) न बढ़े भले ही पूर्ति (समझ रहे हैं न???) सम्भव हो जाये। चलिए कल 14 फरवरी को वेलेण्टाइन डे जिन-जिन लोगों ने अपने स्तर (शारीरिक) पर मना लिया है वे 14 नवम्बर को बाल दिवस मनाने के लिए भी तैयार रहें। क्या नौ माह बाद बाल दिवस नहीं मनायेंगे?

2 comments:

विनय said...

वाह सेंगर जी बहुत बढ़िया है, बधाई!

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गुलाबी कोंपलें

Udan Tashtari said...

ये भी सोच का एक आयाम है.