03 January 2009

राष्ट्रीयता से खिलवाड़ कब तक????

छोटे में पढ़ा था और आज तक कई बार पढ़ते भी रहे हैं कि खेलों से भाईचारा बढ़ता है, आपसी सम्बन्ध बहुत गहरे होते हैं। इधर हमारा देश अपने पडोसी देश पाकिस्तान से खेलों के सहारे ही आपसी दुश्मनी को, कटुता को भुलाने के लिए लगातार प्रयासरत है. क्रिकेट का आयोजन तो प्रतिवर्ष किसी दूसरे देश की धरती पर होता है. इससे दोनों देशों के बीच संबंधों में मधुरता आई हो या न आई हो पर दोनों देशों के क्रिकेट बोर्ड को लाभ जरूर हुआ. सोचिये जब एक तरफ़ सरकारें खेलों के सहारे आपसी संबंधों को सुधरने की बात कर रहीं हैं तब हमारे देश के खिलाड़ी ही खेलों के सहारे आपसी संबंधों को बिगाड़ने पर आमादा हैं।

जिन-जिन लोगों ने एक-दो दिन पुराने समाचारों को देखा सुना हो उनको पता चला होगा कि क्रिकेट के एक खिलाड़ी पटौदी ने अपनी बिन मांगी सलाह सरकार को दी कि होकी से राष्ट्रीय खेलों का दर्जा छीन लिया जाए. इस तरह की टिपण्णी से क्या खेलों का स्तर सुधरेगा या फ़िर होकी से राष्ट्रीय खेल का दर्जा छीन लेने से उसमें सुधार आ जाएगा? अपने देश में ये बहुत बड़ी दिक्कत है कि किसी भी समस्या को सुधारने के बजाय उसको उलझाने का प्रयास किया जाता है. पटौदी के लिए ये कहना आसन है कि किसका दर्जा छीन लिया जाए और किसको दे दिया जाए पर ये बताना उनके लिए जिम्मेवारी का काम नहीं है कि कैसे राष्ट्रीय खेल की गरिमा को बनाए रखा जाए?

देखा जाए तो अपने देश के लिए ये नई बात नहीं है. इससे पहले भी देश की राष्ट्रीयता को लेकर सवाल खड़े किए जाते रहें हैं. पहले भी एक बार राष्ट्रगान को लेकर वरिष्ठ नेताओं, मंत्रियों द्वारा भी आपत्तिजनक बयान दिए जाते रहे हैं. राष्ट्रगान के गान के समय खड़े न होकर भी उसके प्रति अपनी अनादरपूर्ण हरकत को दर्शाया जा चुका है. ये बात सही हो सकती है कि वर्तमान राष्ट्रगान को जोर्ज पंचम के भारत आने पर गाया गया था और उसके बाद देश के आजाद होने पर उसी को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार लिया गया. क्या कारण रहे कि इसी गीत को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया गया?

परिवर्तन प्रकृति का सनातन सत्य है पर परिवर्तन जो व्यक्ति के हाथ में हो उसका कोई तो आधार होना चाहिए ये नहीं कि बस मन किया और हो गया परिवर्तन. वैसे भी देश की राष्ट्रीय संपत्ति से किया जाने वाला परिवर्तन अकारण न होना चाहिए. कल को सम्भव है कि राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के रंगों में परिवर्तन की बात उठाई जाने लगे। आख़िर एक रंग "केसरिया" (दूसरा शब्द भगवा) भाजपा का जो है।

इस तरह कब तक कुछ निजी लाभों के लिए राष्ट्र से, उसकी अस्मिता से, उसकी अखंडता से खिलवाड़ करते रहेंगे?

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